भीनमाल/जालोर। राजस्थान में 'जीरो टॉलरेंस' के सरकारी दावों की जमीनी हकीकत देखनी हो, तो जालोर जिले के भीनमाल विधानसभा क्षेत्र का रुख कीजिए। यहां शासन और प्रशासन की नाक के नीचे बजरी माफिया का ऐसा खुला तांडव चल रहा है, जिसने कानून व्यवस्था की धज्जियां उड़ा कर रख दी हैं। राज्य सरकार भले ही राजस्व वृद्धि और सुशासन की दुहाई देकर अपनी पीठ थपथपाती रहे, लेकिन हकीकत यह है कि स्थानीय खान विभाग और पुलिस प्रशासन पूरी तरह घुटने टेक चुका है। सरकारी खजाने को प्रतिदिन लाखों रुपये के राजस्व की सीधी चपत लगाई जा रही है, और यह सब कुछ सत्ताधारी दल के सफेदपोश आकाओं के इशारे पर बेखौफ अंदाज में जारी है। आखिर किसकी शह पर नदियां छलनी हो रही हैं? क्यों आला हुक्मरान आंखें मूंदे बैठे हैं? यह सवाल अब भीनमाल की चौपालों से निकलकर सीधे राजधानी जयपुर में सत्ता के गलियारों तक गूंज रहा है।
दिनदहाड़े नदियों का कत्ल, बेबस कानून और बेलगाम सिंडिकेट
भीनमाल विधानसभा क्षेत्र के खानपुर, भरुड़ी, घासेड़ी, कुशलपुरा, नरता और दासपां गांवों की सरहद से गुजरने वाली नदियों में इन दिनों सिर्फ बजरी नहीं, बल्कि कानून की साख भी खोदी जा रही है। ग्रामीणों के अनुसार, यहां भारी-भरकम पोकलेन और एलएंडटी मशीनें चौबीसों घंटे गरजती हैं। नियमों के मुताबिक सूर्यास्त के बाद किसी भी प्रकार का खनन या परिवहन पूरी तरह वर्जित है, लेकिन यहां आधी रात को सड़कों पर डंपरों और ट्रेलरों का ऐसा रेला निकलता है मानो कोई सरकारी प्रोजेक्ट चल रहा हो।
पर्यावरण और खनन नियमों को ताक पर रखकर नदियों की तलहटी को 20 से 30 फीट गहरा खोद दिया गया है। इससे न केवल इलाके का भूजल स्तर रसातल में जा रहा है, बल्कि आसपास के कृषि कुओं का पानी भी सूखने की कगार पर पहुंच गया है। ग्रामीणों का स्पष्ट आरोप है कि इस पूरे गोरखधंधे में सत्ताधारी दल के पूर्व एवं वर्तमान जनप्रतिनिधियों की सीधी और परोक्ष भागीदारी है। एक तय सिंडिकेट के जरिए प्रतिदिन होने वाली इस अवैध कमाई का 'मोटा हिस्सा' राजनीतिक रसूखदारों और स्थानीय अफसरों की जेबों तक पहुंचाया जा रहा है।
रॉयल्टी के नाम पर समानांतर सरकार: जबरन वसूली और दहशत का राज
इस पूरे खेल का सबसे डरावना पहलू है 'अवैध रॉयल्टी वसूली'। देलवाड़ा, मुंथला और खानपुर क्षेत्र के ग्रामीणों ने सीधे तौर पर खुलासा किया है कि नदियों और प्रमुख मार्गों पर गैर-कानूनी चेकपोस्ट जैसी व्यवस्था खड़ी कर दी गई है। लाठी-डंडों से लैस निजी गुर्गे हर वाहन से रॉयल्टी के नाम पर जबरन हजारों रुपये की रसीदें काट रहे हैं या बिना रसीद ही नकद वसूली कर रहे हैं।
जो भी स्थानीय किसान या ट्रैक्टर चालक इसका विरोध करता है, उसे झूठे मुकदमों में फंसाने और गाड़ियां जब्त करवाने की खुली धमकी दी जाती है। ग्रामीणों का सवाल बिल्कुल सीधा है—यदि यह वसूली वैध है, तो इसे वसूलने वाले लोग कौन हैं? उनकी अधिकृत पहचान क्या है? और सबसे बड़ा सवाल यह कि इस वसूली की फूटी कौड़ी भी सरकारी खाते में जा रही है या फिर निजी तिजोरियां भरी जा रही हैं? इससे पहले भाजपा प्रदेश अध्यक्ष से लेकर जिले के आला पुलिस-प्रशासनिक अधिकारियों तक लिखित शिकायतें दी गईं, लेकिन हर बार फाइलें दबा दी गईं। इससे साफ जाहिर होता है कि रसूखदारों का शिकंजा सिस्टम की गर्दन पर कितना गहरा है।
पुलिस और खान विभाग की 'संदेहास्पद चुप्पी': सांठगांठ या लाचारी?
भीनमाल में बजरी का यह अवैध खेल कोई एक-दो दिन की पैदाइश नहीं है, बल्कि महीनों से बदस्तूर जारी है। ऐसे में स्थानीय पुलिस और खान विभाग की भूमिका सीधे तौर पर कठघरे में खड़ी होती है:
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गश्त के नाम पर खानापूर्ति: मुख्य सड़कों से लेकर अंदरूनी लिंक रोड्स तक ओवरलोड डंपर बेरोकटोक दौड़ते हैं, लेकिन थाने की पुलिस को कभी ये वाहन नजर नहीं आते।
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मुखबिर तंत्र की नाकामी: आम जनता को पता है कि किस नाके से कितने डंपर निकल रहे हैं, मगर खान विभाग की फ्लाइंग स्क्वॉड को भनक तक नहीं लगती।
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दबाव की आड़ में चुप्पी: ग्रामीणों का आरोप है कि जब भी कोई ईमानदार कनिष्ठ अधिकारी कार्रवाई की हिम्मत जुटाता है, तो 'ऊपर' से फोन घनघना उठते हैं और मामला रफा-दफा कर दिया जाता है।
सरकारी मशीनरी की यह रहस्यमयी निष्क्रियता साबित करती है कि यह तंत्र माफिया के आगे नतमस्तक हो चुका है।
मुख्यमंत्री को भेजा गया खुला अल्टीमेटम: स्थानीय जांच पर अविश्वास, राज्यस्तरीय टीम की मांग
पानी जब सिर से ऊपर निकल गया, तो देलवाड़ा, मुंथला और खानपुर के करीब एक दर्जन जागरूक ग्रामीणों ने लामबंद होकर सीधे मुख्यमंत्री को ज्ञापन भेजा है। ग्रामीणों ने ज्ञापन में दो टूक शब्दों में कहा है कि स्थानीय प्रशासन पूरी तरह दबाव में है, इसलिए जिला स्तर की किसी भी जांच पर उन्हें भरोसा नहीं है।
ग्रामीणों ने मांग उठाई है कि:
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राज्यस्तरीय विजिलेंस टीम का गठन: राजधानी से विशेष जांच दल (SIT) को तुरंत भीनमाल भेजा जाए, जो बिना किसी स्थानीय सूचना के सीधे प्रभावित नदी क्षेत्रों में आकस्मिक छापेमारी करे।
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सख्त सैटेलाइट और ड्रोन सर्वे: ड्रोन कैमरों के जरिए खनन क्षेत्रों की नपाई की जाए ताकि यह साफ हो सके कि स्वीकृत सीमा से कितने लाख टन अधिक बजरी लूटी जा चुकी है।
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वसूली और जब्ती: अब तक लूटे गए सरकारी राजस्व का पूरा आकलन कर उसकी वसूली संबंधित माफिया और उनके राजनीतिक आकाओं की संपत्तियों से की जाए।
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मिलीभगत पर एफआईआर: अवैध वसूली करने वाले गिरोह और उन्हें संरक्षण देने वाले अधिकारियों पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मुकदमे दर्ज हों।
जनता की दो टूक चेतावनी
भीनमाल की जनता अब और खामोश बैठने के मूड में नहीं है। ग्रामीणों और स्थानीय संगठनों ने प्रशासन और सरकार को साफ चेता दिया है कि यदि इस ज्ञापन के बाद भी फाइलों को दबाने की कोशिश की गई या केवल छोटे-मोटे ड्राइवरों पर कार्रवाई कर 'बड़ी मछलियों' को बचाया गया, तो यह लड़ाई केवल कागजों तक सीमित नहीं रहेगी। आने वाले दिनों में भीनमाल के हजारों नागरिक सड़कों पर उतरकर उपखंड कार्यालय और हाईवे का घेराव करेंगे, जिसकी पूरी जिम्मेदारी गूंगे-बहरे बने बैठे स्थानीय प्रशासन और सरकार की होगी। अब गेंद मुख्यमंत्री के पाले में है—या तो वे माफिया पर बुलडोजर चलाकर 'सुशासन' का प्रमाण दें, या फिर यह मान लिया जाए कि सत्ता की सरपरस्ती में यह लूट यूं ही चलती रहेगी।










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