सांचौर। पंचायत चुनाव के मुहाने पर खड़ी भारतीय जनता पार्टी के लिए सांचौर से आई तस्वीरें संगठन के माथे पर गहरी चिंता की लकीरें खींच रही हैं। जिला प्रभारी भूपेंद्र सैनी की मौजूदगी में आयोजित भाजपा की महत्वपूर्ण सभा में जुटी मुट्ठी भर भीड़ ने केवल खाली कुर्सियों का नजारा ही पेश नहीं किया, बल्कि बंद कमरों में चल रही अंदरूनी खींचतान को सीधे सड़क पर ला पटका है। कार्यकर्ताओं की बेरुखी और पदाधिकारियों की खामोशी अब स्थानीय राजनीति में खुलेआम चर्चा का विषय बन चुकी है।
खाली कुर्सियां या खुला संदेश?
चुनाव की दहलीज पर जब पार्टी का पूरा अमला गांव-ढाणी में सक्रिय होना चाहिए, उस वक्त वरिष्ठ प्रभारी की मौजूदगी वाली सभा में कार्यकर्ताओं का न पहुंचना केवल समन्वय की कमी नहीं, बल्कि एक सुनियोजित 'साइलेंट बायकॉट' की ओर इशारा कर रहा है। राजनीतिक गलियारों में इस बात की तेज चर्चा है कि स्थानीय संगठन में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा और जमीनी कार्यकर्ता अपनी उपेक्षा का जवाब दूरी बनाकर दे रहे हैं।
जयपुर पैनल पर 'मनमर्जी' की कैंची
पार्टी के भीतर सबसे बड़ा लावा टिकट वितरण को लेकर फूटा है। सूत्रों के मुताबिक, जयपुर में प्रदेश नेतृत्व के स्तर पर तैयार पैनल में जिन चेहरों को प्राथमिकता दी गई थी, उन्हें ऐन वक्त पर दरकिनार कर दिया गया। आरोप हैं कि जमीनी पकड़ वाले कार्यकर्ताओं की जगह नेतृत्व के 'पसंदीदा' लोगों को तरजीह दी गई। टिकट वितरण के इस कथित खेल ने उन दावेदारों और कार्यकर्ताओं को पूरी तरह भड़का दिया है, जो महीनों से पार्टी का झंडा उठाए घूम रहे थे। हालांकि, पार्टी ने आधिकारिक तौर पर इन आरोपों पर कोई औपचारिक बयान नहीं दिया है, लेकिन कार्यकर्ताओं का रोष अब छिपाए नहीं छिप रहा।
जिलाध्यक्ष जसराज पुरोहित पर गहराया संकट
सभा में फजीहत के बाद सारा दारोमदार जिलाध्यक्ष जसराज पुरोहित की कार्यशैली पर आकर टिक गया है। कार्यकर्ताओं के साथ संवादहीनता, मनमाने फैसले और गुटीय राजनीति को शह देने के दावों ने जिलाध्यक्ष की कुर्सी को सवालों के घेरे में ला खड़ा किया है। हाल ही में सोशल मीडिया पर हरीश कुमार पुरोहित द्वारा जिलाध्यक्ष को लेकर की गई तीखी और अपमानजनक टिप्पणी ने आग में घी डालने का काम किया था। हालांकि किसी एक व्यक्ति की टिप्पणी को पूरे संगठन का रुख नहीं माना जा सकता, लेकिन इस तरह की बयानबाजी का सार्वजनिक होना यह साबित करता है कि नेतृत्व के खिलाफ नाराजगी किस हद तक सुलग रही है।
भाजपा के लिए खतरे की घंटी
सांचौर का यह घटनाक्रम सामान्य चुनावी असंतोष से कहीं ज्यादा गंभीर है:
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बूथ स्तर का बिखराव: पंचायत चुनाव पूरी तरह स्थानीय समीकरणों और बूथ कार्यकर्ताओं के पसीने पर लड़े जाते हैं। अगर ब्लॉक और मंडल स्तर का कैडर ही नाराज होकर घर बैठ गया, तो इसका सीधा फायदा विरोधी दलों को मिलना तय है।
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नेतृत्व के प्रति अविश्वास: जब कार्यकर्ता यह मानने लगे कि संगठन में वफादारी और मेहनत के बजाय 'निजी पसंद' को तवज्जो मिल रही है, तो सांगठनिक ढांचा ताश के पत्तों की तरह ढहने लगता है।
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समय की कमी: चुनाव सिर पर हैं और डैमेज कंट्रोल के लिए वक्त बेहद कम है। असंतुष्ट गुटों को मनाने में नाकाम रहने पर बागी उम्मीदवार पार्टी का खेल बिगाड़ सकते हैं।
अब सवाल यह उठता है कि क्या जयपुर का शीर्ष नेतृत्व सांचौर की इस सुलगती चिंगारी को समय रहते बुझा पाएगा, या फिर गुटबाजी का यह जिन्न पंचायत चुनाव में पार्टी को भारी नुकसान पहुंचाएगा? आने वाले कुछ दिन सांचौर भाजपा की दशा और दिशा दोनों तय करेंगे।









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