अहमदाबाद। गुजरात के सुप्रसिद्ध शक्तिपीठ अरासुरी अंबाजी माता देवस्थान के मालिकाना हक को लेकर पिछले सात दशकों से चला आ रहा कानूनी संघर्ष अब अपने निर्णायक पड़ाव पर पहुंच गया है। गुजरात हाईकोर्ट ने बुधवार (24 दिसंबर) को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया है कि मंदिर किसी राजपरिवार की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि एक सार्वजनिक ट्रस्ट है, जिसकी मालिक स्वयं 'मां अंबाजी' (कानूनी रूप से देवता) हैं।
विवाद की जड़: क्या मंदिर महाराजा की 'निजी संपत्ति' है?
विवाद का मुख्य केंद्र दांता स्टेट के पूर्व राजपरिवार का वह दावा था, जिसमें अंबाजी मंदिर को अपनी निजी संपत्ति (Private Property) बताया गया था। महाराणा महिपेंद्रसिंहजी परमार द्वारा दायर अपील में कहा गया था कि यह मंदिर उनके पूर्वजों की विरासत है और इसका प्रबंधन किसी सरकारी ट्रस्ट को सौंपना गैर-कानूनी है।

हाईकोर्ट का कड़ा रुख: 'देवता ही कानूनी मालिक'
जस्टिस एच. एम. प्रच्छक ने सुप्रीम कोर्ट के 'पद्मनाभस्वामी मंदिर' केस का हवाला देते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की:
"अरासुरी अंबाजी मंदिर एक सार्वजनिक धार्मिक संस्था है। कानून की नजर में देवता (मां अंबाजी) एक 'कानूनी व्यक्ति' हैं और मंदिर की तमाम संपत्ति उन्हीं की है। कोई भी व्यक्ति या राजपरिवार भगवान की संपत्ति पर मालिकाना हक नहीं जता सकता।"
अधिकारों की कटौती: अब नहीं चलेगी 'पब्लिक' को बाहर रखने की परंपरा
कोर्ट ने दांता राजपरिवार के उस विशेष अधिकार को पूरी तरह खत्म कर दिया है, जो सबसे अधिक विवादित था:
- अष्टमी की विशेष पूजा: अब तक नवरात्रि के आठवें दिन (अष्टमी) को राजपरिवार मंदिर में विशेष पूजा और हवन करता था।
- आम भक्तों पर पाबंदी: इस पूजा के दौरान आम श्रद्धालुओं को मंदिर परिसर से बाहर कर दिया जाता था।
- कोर्ट का आदेश: हाईकोर्ट ने कहा कि जब लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं, तो किसी एक पक्ष के लिए आम जनता के अधिकारों को कम नहीं किया जा सकता। अब अष्टमी पर राजपरिवार को ऐसी कोई 'विशेष एकांत पूजा' का अधिकार नहीं होगा जिससे आम भक्तों को रोका जाए।
इतिहास के झरोखे से: कब, क्या और कैसे हुआ?
| समय काल | घटनाक्रम और अदालती फैसले |
| आजादी से पहले (1934-1937) | सिविल कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि महाराजा मंदिर के 'मालिक' नहीं बल्कि केवल 'प्रशासक' (Administrator) हैं। |
| 1948 (मर्जर एग्रीमेंट) | दांता रियासत का भारत में विलय हुआ। महाराजा ने मंदिर को 'निजी संपत्ति' की सूची में रखा, जिसे सरकार ने खारिज कर दिया। |
| 1957 (सुप्रीम कोर्ट) | सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने कहा कि महाराजा मालिकाना हक साबित करने में विफल रहे। आर्टिकल 363 के तहत विलय समझौतों को दोबारा नहीं खोला जा सकता। |
| 2008-2009 | बनासकांठा जिला अदालत ने मंदिर को पब्लिक ट्रस्ट घोषित किया, जिसे राजपरिवार ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। |
| दिसंबर 2025 | गुजरात हाईकोर्ट ने जिला अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए राजपरिवार की अपील खारिज की। |
क्या बचा है अब 'एक्स-महाराजा' के पास?
हालांकि कोर्ट ने मालिकाना हक और विशेष पूजा के दावों को खारिज कर दिया है, लेकिन परंपराओं का सम्मान करते हुए कुछ बिंदु स्पष्ट किए हैं:
- प्रतीकात्मक भागीदारी: राजपरिवार के सदस्य एक सामान्य श्रद्धालु की तरह पूजा में शामिल हो सकते हैं।
- सम्मान: महत्वपूर्ण उत्सवों (जैसे भादरवी पूनम) के दौरान उन्हें पूर्व राजपरिवार के प्रतिनिधि के रूप में उचित शिष्टाचार दिया जा सकता है, लेकिन यह 'अधिकार' नहीं बल्कि 'परंपरा' का हिस्सा होगा।
- प्रशासन से बाहर: मंदिर का पूरा वित्तीय और प्रशासनिक नियंत्रण गुजरात सरकार के अधीन 'अरासुरी अंबाजी माता देवस्थान ट्रस्ट' के पास ही रहेगा।
आस्था और कानून का मिलन
यह फैसला न केवल कानूनी रूप से महत्वपूर्ण है, बल्कि सामाजिक संदेश भी देता है कि 'ईश्वर के दरबार में राजा और रंक सब बराबर हैं'। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि प्राचीन विरासतें किसी व्यक्ति विशेष की जागीर नहीं, बल्कि जन-जन की आस्था का केंद्र हैं। सात दशक पुराने इस विवाद के खत्म होने से अब मंदिर के विकास और श्रद्धालुओं की सुविधाओं के विस्तार का मार्ग और भी प्रशस्त होगा।







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