रजब पठान । सर्कल न्यूज नेटवर्क | रानीवाड़ा
रानीवाड़ा और मालवाड़ा के बीच स्थित आस्था और कौमी एकता की मिसाल सांईजी की बेरी में हजरत हाजी कादर शाह बाबा का 49वां सालाना उर्स बड़े ही अदब और धूमधाम से मनाया जा रहा है। उर्स का आगाज 28 अक्टूबर को दरगाह के बुलंद दरवाजे पर परचम कुशाई (झंडारोहण) की रस्म के साथ होगा। इस खास मौके पर दरगाह शरीफ को खूबसूरत रंग-बिरंगी रोशनी और रंग-रोगन से सजाया जा रहा है। सालाना उर्स में मुल्क भर से अकीदतमंद और जायरीन अपनी मन्नतें और मुरादें लेकर बाबा के दरबार में हाजिरी देंगे।
परचम कुशाई से आगाज, दिल्ली के कव्वाल पेश करेंगे रूहानी कलाम
दरगाह कमेटी के सदर मिस्त्री आबाद खान ने प्रोग्राम की पूरी जानकारी देते हुए बताया कि 49वें सालाना उर्स की शुरुआत 28 अक्टूबर की सुबह 11 बजे होगी। गुजरात के डीसा शरीफ से पीर-ए-तरीकत सैय्यद मोहम्मद अली कादरी और सैय्यद हसन अली कादरी की जानिब से मुबारक परचम भेजा जाएगा। इसके बाद दरगाह के बुलंद दरवाजे पर सदर आबाद खान और खादिम सिद्दीक बख्श सहित कमेटी के सभी मेंबर परचम कुशाई की रस्म अदा करेंगे। इसी के साथ उर्स का मुबारक सिलसिला शुरू होगा।
29 अक्टूबर को दोपहर की नमाज के बाद कुरानख्वानी, संदल शरीफ और चादर-गुलाबपोशी की रस्म अदा की जाएगी। इसी दिन आम लोगों के लिए बड़े लंगर की शुरुआत होगी। रात में महफिल का आयोजन होगा, जिसमें हिंदुस्तान के मशहूर कव्वाल आमिल आरिफ साबरी (दिल्ली वाले) अपनी दिलकश आवाज में सूफियाना कलाम और कव्वालियां पेश करेंगे। उर्स का समापन 30 अक्टूबर (शुक्रवार) की सुबह कुल की फातिहा और मुल्क में अमन-चैन की दुआ के साथ होगा।
कौमी एकता और भाईचारे की जीती-जागती मिसाल
सांईजी की बेरी स्थित हजरत हाजी कादर शाह बाबा की दरगाह आपसी भाईचारे और कौमी एकता का बड़ा मरकज है। यहां जात-पात और मजहब का कोई फर्क नहीं देखा जाता। हर धर्म के लोग पूरी अकीदत से बाबा की मजार पर फूल और चादर पेश करते हैं। ऐसी मान्यता है कि बाबा के दर पर आने वाला कोई भी इंसान खाली हाथ नहीं लौटता और सूफी संत हाजी कादर शाह बाबा हर फरियादी के रंज-ओ-गम और दुख-दर्द दूर करते हैं।
बीमारियों से निजात दिलाने वाला करामाती नीम: एक ही पेड़ पर मीठे और कड़वे पत्ते
दरगाह के खादिम ने बताया कि पुराने जमाने में जब आसपास इलाज और डॉक्टरों की सहूलियत नहीं थी, उस वक्त हाजी कादर बाबा ने अपनी दुआ और साधना से नीम की एक डाली को सिद्ध करके दरगाह में लगाया था। यह नीम का पेड़ आज भी दरगाह पर मौजूद है और लोग इसे 'हकीम नीम' का दर्जा देते हैं।
इस पेड़ की सबसे बड़ी करामात यह है कि नीम के बाकी पत्ते तो कड़वे हैं, लेकिन बाबा की लगाई खास डाली के पत्ते बिल्कुल मीठे हैं। जायरीन इन मीठे पत्तों को तबर्रुक मानकर कई जिस्मानी बीमारियों के इलाज के लिए इस्तेमाल करते हैं। इसके अलावा इस पेड़ की एक बड़ी जड़ जमीन से बाहर निकली हुई है; ऐसी मान्यता है कि अगर किसी बच्चे को बड़ी खांसी (काली खांसी) की तकलीफ हो, तो उसे इस जड़ के नीचे से सात बार निकालने पर बीमारी खत्म हो जाती है।
जायरीनों की सहूलियत के लिए उम्दा इंतजाम
उर्स में आने वाली भारी भीड़ को देखते हुए उर्स इंतजामिया कमेटी ने पुख्ता इंतजाम किए हैं। दूर-दराज से आने वाले जायरीनों के ठहरने, पीने के पानी, रोशनी और लंगर की माकूल व्यवस्था की जा रही है, ताकि किसी भी जायरीन को किसी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े।









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