राजस्थान भाजपा की राजनीति में उस वक्त भारी भूचाल आ गया, जब पार्टी की वरिष्ठ नेत्री डॉ. शीला बिश्नोई ने प्रदेश संगठन और स्थानीय नेताओं की मनमानी के खिलाफ खुला मोर्चा खोलते हुए अपने सभी पदों और प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। "समर्पित कार्यकर्ताओं का अपमान और चंद नेताओं की मनमर्जी अब बर्दाश्त से बाहर है"—यह कड़ा संदेश देते हुए उन्होंने सीधे प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ को त्यागपत्र थमाकर पार्टी के भीतर मचे घमासान की पोल खोल दी है।
- निष्ठावानों की अनदेखी पर तीखा प्रहार: डॉ. शीला बिश्नोई ने स्पष्ट किया कि जिन्होंने वर्षों तक पसीना बहाकर पार्टी को सींचा, आज उन्हीं समर्पित कार्यकर्ताओं की भावनाओं और सम्मान को कुचला जा रहा है।
- स्थानीय नेताओं की मनमानी से उपजा रोष: संगठन के फैसलों में वरिष्ठ पदाधिकारियों व जमीनी कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर केवल अपनी मनमर्जी चलाने वाले नेताओं की कार्यशैली पर कड़ा ऐतराज जताया गया है।
- आत्मसम्मान से समझौता नामंजूर: उन्होंने साफ किया कि यह लड़ाई किसी पद या स्वार्थ की नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और संगठन के मूल सिद्धांतों की रक्षा की है। जब सिद्धांतों पर चोट हो, तो खामोश रहना नामुमकिन था।
- संगठन को दी आत्ममंथन की नसीहत: पत्र में आईना दिखाते हुए चेताया गया कि पार्टी की असली ताकत कुर्सी या बड़े नेता नहीं, बल्कि खून-पसीना बहाने वाले कार्यकर्ता होते हैं; ऐसे में संगठन को अपनी कार्यप्रणाली पर तुरंत मंथन करने की जरूरत है।









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