ओसियां / जोधपुर
सियासत में जब महत्वाकांक्षा जमीन से कट जाती है, तो जनता अर्श से फर्श पर लाने में जरा भी देर नहीं लगाती। मारवाड़ की राजनीति के कद्दावर चेहरे और पूर्व राज्यमंत्री शंभूसिंह खेतासर के सियासी आंगन से ऐसी ही एक चौंकाने वाली खबर सामने आई है, जिसने पूरे इलाके के राजनीतिक पंडितों को हैरान कर दिया है। पूरे ओसियां इलाके पर कभी 'प्रधान' बनकर राज करने वाली उनकी पत्नी बदन कंवर अब सीधे 'सरपंच' का चुनाव हार गई हैं।
गली-चौराहों पर अब एक ही चर्चा है—आखिर ऐसी क्या मजबूरी या सियासी लालच था कि ब्लॉक का ताज पहनने वाले परिवार को गांव की चौखट पर पंचायत लड़ने उतरना पड़ा?
बड़ा ओहदा छोड़ छोटे पद का लालच: सियासी डिमोशन या सत्ता का मोह?
साल 2021 में जब सियासी बिसात बिछी थी, तब भाजपा और आरएलपी के गठजोड़ के दम पर बदन कंवर ओसियां पंचायत समिति की प्रधान बनी थीं। प्रधान का रुतबा पूरे उपखंड के दर्जनों गांवों, सैकड़ों सरपंचों और अरबों के बजट पर भारी पड़ता है।
लेकिन, लोकतंत्र में पद की गरिमा और राजनीति की चाल तब सवालों के घेरे में आ गई जब प्रधान रह चुकीं बदन कंवर ने अचानक अपने ही गांव में सरपंच पद के लिए ताल ठोक दी। स्थानीय लोगों के बीच इस बात की तीखी चर्चा है:
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क्या सत्ता का ऐसा नशा था कि बिना किसी पद के रहना गवारा नहीं हुआ?
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या फिर यह राजनीतिक असुरक्षा थी, जिसने प्रधान स्तर के नेता को सरपंच के छोटे चुनावी दंगल में उतरने पर मजबूर कर दिया?
नतीजा वही हुआ जो अक्सर सियासी लालच और जमीनी नाराजगी का होता है—गांव की जनता ने इस "रिवर्स गियर" राजनीति को नकारते हुए उन्हें हार का मुंह दिखा दिया।
शंभूसिंह खेतासर का हार से पुराना नाता: बड़े दिग्गजों से लड़े, पर जीत हमेशा छिटकी
शंभूसिंह खेतासर का राजनीतिक सफर हमेशा से भारी उठापटक और बड़े चुनावी दावों के बीच हार के साए में रहा है:
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2008 में महिपाल मदेरणा से टक्कर: ओसियां विधानसभा से निर्दलीय मैदान में कूदकर ताल ठोकी, लेकिन जनता ने जीत का सेहरा नहीं बांधा।
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सरदारपुरा में अशोक गहलोत से मुकाबला: भाजपा ने उन्हें तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के खिलाफ सरदारपुरा से उतारा। वहां भी उन्हें करारी शिकस्त झेलनी पड़ी।
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राज्यमंत्री का रुतबा: लगातार हार के बावजूद पार्टी ने उन्हें राजस्थान राज्य बीज निगम का अध्यक्ष बनाकर राज्यमंत्री का दर्जा दिया, जिससे उनका सियासी रसूख कायम रहा।
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2023 की मजबूरी: 2023 के विधानसभा चुनाव में ओसियां से टिकट की उम्मीद टूटने के बाद उन्होंने पार्टी लाइन पर चलते हुए भैराराम सियोल का समर्थन किया।
आगे क्या? खेतासर परिवार के सियासी भविष्य पर संकट के बादल
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विधानसभा और पंचायत चुनावों के समीकरण अलग होते हैं, लेकिन किसी बड़े परिवार के लिए प्रधान से उतरकर सरपंच का चुनाव लड़ना और फिर उसमें भी हार जाना एक बड़ा मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक झटका है।
इस हार ने न सिर्फ खेतासर परिवार की जमीनी पकड़ पर सवालिया निशान लगा दिया है, बल्कि ओसियां और जोधपुर की राजनीति में विरोधियों को बैठे-बिठाए हमला करने का मौका भी थमा दिया है। क्या यह खेतासर परिवार के सियासी रसूख के ढलान की शुरुआत है, या आगे कोई नया पैंतरा बाकी है? ओसियां की सियासत में यह सवाल अब सबसे ज्यादा गूंज रहा है।









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