'जो कुछ मिला है, वह सब प्रभु का है' - समर्पण भाव से कर्म करने पर ही मिलता है पुण्य का फल
सिरोही, 16 जुलाई 2026 पावापुरी तीर्थ-जीव मैत्रीधाम में आज आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार हुआ। युवा आचार्य श्री लब्धिवल्लभसूरीजी महाराज ने तीर्थ के सेवाभावी स्टॉफ सदस्यों को जीवन का सार समझाते हुए कहा कि प्रभु की कृपा के बिना मनुष्य कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकता।
अहंकार ही पाप का मूल कारण आचार्यश्री ने अपने सारगर्भित प्रवचन में कहा कि मनुष्य सुख की लालसा में पाप का मार्ग चुनता है, जो अंततः दुख का कारण बनता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि 'मैं' का भाव व्यक्ति के भीतर अभिमान पैदा करता है और यही अभिमान अधर्म की ओर ले जाता है। उन्होंने कहा, "व्यक्ति को सदैव यह भाव रखना चाहिए कि जो कुछ भी मेरे पास है, वह सब प्रभु का दिया हुआ है। जब हम स्वयं को पूर्णतः प्रभु के चरणों में समर्पित कर देते हैं, तो अहंकार स्वतः समाप्त हो जाता है।"

कर्म ही पूजा है पावापुरी स्टॉफ को भाग्यशाली बताते हुए आचार्यश्री ने कहा कि प्रभु शंखेश्वर पार्श्वनाथ का सानिध्य मिलना सौभाग्य की बात है। उन्होंने कहा कि आप जो कार्य यहाँ कर रहे हैं, वह केवल नौकरी नहीं, बल्कि साक्षात् प्रभु की पूजा है। उन्होंने सभी से आग्रह किया कि अपने कर्तव्यों का पालन पूरी निष्ठा, वफादारी और लगन के साथ करें। उन्होंने चेताया कि कर्मों का फल अटल है, इसलिए सर्वकल्याण की भावना रखते हुए अधिक से अधिक पुण्य अर्जित करें।
के.पी. संघवी परिवार के सेवा कार्य की अनुमोदना आचार्यश्री ने के.पी. संघवी परिवार की उदारता की मुक्तकंठ से प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि इस तीर्थ और जीव मैत्रीधाम की स्थापना न केवल शासन की प्रभावना है, बल्कि यह जीवदया का एक अनूठा उदाहरण है, जिससे हजारों लोगों को रोजगार भी मिल रहा है।

कार्यक्रम की झलकियाँ
- प्रारंभिक संबोधन: पावापुरी ट्रस्ट के मैनेजिंग ट्रस्टी महावीर जैन ने आचार्यश्री और साधु-संतों का वंदन किया। उन्होंने बताया कि यहाँ का स्टॉफ इसे नौकरी नहीं, बल्कि अपना घर समझकर समर्पित भाव से सेवा कर रहा है।
- भक्तिमय माहौल: संगीतकार गोविंद कुमार ने 'गुरूदेव के चरणों की धुल मिल जाए...' गीत प्रस्तुत कर वातावरण को भक्तिमय बना दिया।
- आचार्यश्री का परिचय: आचार्यश्री मूलतः पाली जिले के किरवा के निवासी हैं। मात्र 8 वर्ष की आयु में संयम पथ अपनाया। विशेष बात यह है कि उनके सांसारिक पिताश्री ने भी दीक्षा ली है और आज वे मुनिराज के रूप में उनके साथ सेवा पथ पर हैं।
- आगामी चतुर्मास: आचार्यश्री का इस वर्ष का चतुर्मास 7वीं शताब्दी के प्राचीन तीर्थ 'मीरपुर' में होगा। इसका प्रवेश 27 जुलाई 2026 को निर्धारित है, जिसका लाभ मुंबई के पंकज भाई कांतीलालजी शाह परिवार को प्राप्त हुआ है।







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