- माउंट आबू के गुरुशिखर के समकक्ष है लोयाणागढ़ की यह पहाड़ी, १० किलोमीटर के पथरीले और ऊबड़-खाबड़ रास्ते को पैदल पार कर पूरी की जनगणना की औपचारिकता
- एसी कमरों की प्रशासनिक शैली छोड़ जब जनभावना और इतिहास को टटोलने खुद निकलीं महिला अधिकारी, तो अरावली की वादियों ने भी दी सलामी
जसवंतपुरा। (ईश्वर सैन) राजस्थान की वीर प्रसूता धरा अपने कण-कण में शौर्य, त्याग और समृद्ध इतिहास समेटे हुए है। जब समूचा राष्ट्र 'जनगणना' जैसे महायज्ञ में अपनी आहुति दे रहा है, तब इसी लोयाणागढ़ की तलहटी से कर्तव्यनिष्ठा की एक ऐसी अद्भुत बानगी देखने को मिली है, जो स्थानीय प्रशासनिक इतिहास में एक स्वर्णिम पृष्ठ के रूप में दर्ज हो गई है।
अरावली की दुर्गम वादियों में स्थित जसवंतपुरा की इस पहाड़ी को 'मिनी माउंट' के नाम से जाना जाता है। इसकी ऊंचाई और माउंट आबू के गुरुशिखर में ज्यादा फर्क नहीं है—यह लगभग उसके समकक्ष ही मानी जाती है। इतनी भीषण ऊंचाई पर बसे ऐतिहासिक दुर्ग पर जनगणना जैसे राष्ट्रीय कार्य के लिए पहुंचना अपने आप में एक बड़ी चुनौती थी। जहां अमूमन अधिकारी वातानुकूलित (एसी) कमरों में बैठकर निर्देश देने की प्रशासनिक शैली को तरजीह देते हैं, वहीं जसवंतपुरा की तहसीलदार नीरज कुमारी ने स्वयं इस दुर्गम और पथरीले रास्ते को नापने का साहसिक फैसला किया।


16 किलोमीटर की दुर्गम चढ़ाई और कर्तव्यबोध
इस ऐतिहासिक किले की महत्ता का जीवंत चित्रण जब तहसील के रीडर गणपतदान चारण ने तहसीलदार के समक्ष किया, तो उनके भीतर इस प्राचीन गढ़ को करीब से जानने की उत्सुकता जागी। इतिहास के पन्नों को उलटते हुए पूर्व विधायक (रानीवाड़ा) नारायण सिंह, गजापुरा के ठाकुर पूरणसिंह और चांदूर के ठाकुर मनोहर सिंह ने एक अत्यंत सार्थक सुझाव दिया कि इस दुर्गम धरोहर पर जनगणना का यह राष्ट्रीय कार्य तहसीलदार को स्वयं जाकर संपन्न करना चाहिए।

यह मार्ग कोई सुगम पगडंडी नहीं, बल्कि लगभग दस किलोमीटर लंबा वह पथरीला, ऊबड़-खाबड़ और दुर्गम पहाड़ी रास्ता है, जो राहगीर के धैर्य की कठोर परीक्षा लेता है। लेकिन, नीरज कुमारी के अदम्य साहस को देखकर यह काव्य पंक्तियां बरबस ही याद आ जाती हैं:
"वह पथ क्या, पथिक कुशलता क्या, जिस पथ पर बिखरे शूल न हों। नाविक की धैर्य कुशलता क्या, जब धाराएं प्रतिकूल न हों।"

अपनी राजस्व टीम, वन विभाग और जनगणना टीम के साथ जब वह इस प्राचीन किले के प्रांगण में पहुंचीं और भवन गणना के कार्यक्रम को संपन्न किया, तो मानो अतीत और वर्तमान का एक शानदार संगम हो गया। उनके बढ़ते कदम केवल एक अधिकारी के कदम नहीं थे, बल्कि वे उस कर्तव्यपरायणता के प्रतीक थे जो तंत्र के अंतिम छोर तक पहुंचने का संकल्प रखती है। उनका यह कदम आज आम जनमानस के बीच गहरी सराहना और युवाओं के लिए प्रेरणा का केंद्र बना हुआ है।

विशेष बॉक्स: जानिए क्या है लोयाणागढ़ (जसवंतपुरा फोर्ट) का गौरवशाली इतिहास?
अरावली की ऊंची उपत्यकाओं में सीना ताने खड़ा जसवंतपुरा का प्राचीन और ऐतिहासिक किला (लोयाणागढ़) आज भी अतीत की शौर्य गाथाओं का मूक साक्षी है।
- जोधपुर दरबार का महल: मध्यकाल में इस वैभवशाली दुर्ग और इसके आसपास के क्षेत्र को 'जोधपुर दरबार के महल (हिजहाईनेस बंगला)' के गौरवशाली नाम से जाना जाता था। यह मारवाड़ के शासकों के लिए सामरिक और रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण स्थल था।
- अजय और सुरक्षित ढांचा: मिनी माउंट की ऊंची पहाड़ियों पर स्थित होने के कारण यह किला दुश्मनों की पहुंच से हमेशा सुरक्षित रहा। इसकी भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि यहां से मीलों दूर तक नजर रखी जा सकती थी।
- सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर: वर्तमान में भले ही इसकी दीवारें जर्जर हो चुकी हों और यहां खामोशी का पहरा हो, लेकिन इसकी स्थापत्य कला और इसके कंगूरे आज भी मारवाड़ के राजपूती वैभव, स्थापत्य कला और अदम्य साहस की गवाही देते हैं। स्थानीय इतिहासकार और ग्रामीण आज भी इस गढ़ को क्षेत्र का स्वाभिमान मानते हैं।







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