चेकला (जसवंतपुरा)। लोकतंत्र की असली ताकत किताबों के पन्नों में नहीं, बल्कि जागरूक उंगलियों के उस एक वोट में बसती है जो भविष्य की तकदीर तय करता है। जब नींव के पत्थर ही मजबूत हों, तो लोकतंत्र की इमारत कभी डगमगा नहीं सकती।
इसी सोच को धरातल पर उतारते हुए राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय चेकला ने एक ऐसी प्रेरक पहल की है, जिसने न केवल बच्चों को वोट की कीमत समझाई, बल्कि यह भी साबित कर दिया कि नेतृत्व का हुनर उम्र का मोहताज नहीं होता।

कक्षा बनी पोलिंग बूथ, बच्चों ने ली निष्पक्ष चुनाव की शपथ
विद्यालय परिसर में आयोजित हुए इस खास ‘मॉक पोल’ में माहौल किसी आम चुनावी दिन जैसा ही गंभीर और उत्साहपूर्ण नजर आया। मतदान कक्ष, कतारबद्ध खड़े नन्हें मतदाता, निष्पक्ष वोटिंग की प्रक्रिया और परिणाम का इंतजार—विद्यार्थियों ने लोकतंत्र के इस उत्सव को पूरी संजीदगी के साथ जिया। इस नवाचार का मुख्य ध्येय बचपन से ही बच्चों में स्वस्थ, पारदर्शी और लोकतांत्रिक मूल्यों की समझ विकसित करना था, ताकि आने वाले कल में वे एक जिम्मेदार नागरिक बन सकें।

हर्षा कँवर के सिर सजा बाल सरपंच का सेहरा
कड़े और निष्पक्ष चुनावी मुकाबले के बाद मतों की गिनती हुई, जिसमें छात्राओं ने बाजी मारी। लोकतांत्रिक तरीके से पड़े वोटों के आधार पर हर्षा कँवर को विद्यालय का 'बाल सरपंच' चुना गया। जीत की घोषणा होते ही समूचा परिसर तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। वहीं पंचायत के अन्य दायित्वों के लिए पांच विद्यार्थियों को 'बाल वार्ड पंच' चुना गया, जिनमें:
- रोहित कुमार
- लक्ष्मी कुमारी
- रवि कुमार
- प्रवीण कुमार
- रवीना कँवर शामिल हैं।

जिम्मेदार नागरिक गढ़ने की दिशा में अनूठा कदम
विद्यालय के प्रधानाध्यापक किशन लाल देवासी ने इस अभिनव प्रयोग पर संतोष जताते हुए बताया कि केवल किताबी ज्ञान से लोकतांत्रिक समझ विकसित नहीं हो सकती। जब बच्चे खुद पर्ची डालकर नेता चुनते हैं और प्रत्याशी की भूमिका निभाते हैं, तब वे मतदान के सही मोल और निष्पक्षता के मायने समझते हैं। कार्यक्रम में विद्यालय के सभी विद्यार्थियों सहित पूरे स्टाफ ने बढ़-चढ़कर सहयोग दिया। ग्रामीण परिवेश के इस स्कूल का यह कदम आज चर्चा का विषय बना हुआ है।









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