शिक्षा केवल चारदीवारी के भीतर बंद किताबों और परीक्षाओं तक सीमित नहीं होती। सच्ची शिक्षा वही है जो जीवन के जीवंत अनुभवों से उपजे, जो दृष्टिकोण का विस्तार करे और भीतर छिपे आत्मविश्वास को जगाए। महान दार्शनिकों ने भी माना है कि एक मील का प्रत्यक्ष भ्रमण सैकड़ों पन्नों के सिद्धांत से अधिक गहरा प्रभाव छोड़ता है। जब युवा पीढ़ी अपने देश की मिट्टी, उसकी सीमाओं और सांस्कृतिक जड़ों को अपनी आंखों से देखती है, तब उनमें राष्ट्रबोध और जीवन मूल्यों की वास्तविक नींव पड़ती है।
सर्कल न्यूज नेटवर्क
मालवाड़ा (जालौर)। महात्मा गांधी राजकीय विद्यालय (अंग्रेजी माध्यम), मालवाड़ा के विद्यार्थियों ने हाल ही में एक प्रेरणादायी शैक्षणिक और ऐतिहासिक भ्रमण पूरा किया। विद्यालय दल ने गुजरात के बनासकांठा जिले में स्थित सुप्रसिद्ध धरणीधर कृष्ण मंदिर (ढीमा) और भारत-पाक अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे नडाबेट सीमांत क्षेत्र का विस्तृत अवलोकन किया।
नडाबेट बॉर्डर: जहां धड़कती है वतन की हिफाजत
गुजरात के कच्छ के रण में स्थित नडाबेट (Nada Bet) भारत-पाक अंतरराष्ट्रीय सीमा का एक संवेदनशील और रणनीतिक बिंदु है। इसे गुजरात का 'वाघा बॉर्डर' भी कहा जाता है।
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बीएसएफ की शौर्यगाथा: विद्यार्थियों ने सीमा सुरक्षा बल (BSF) की 'सीमा दर्शन परियोजना' के तहत बॉर्डर पिलर्स, वॉच टावर और सुरक्षा व्यवस्था का प्रत्यक्ष अनुभव किया। जवानों ने छात्रों को यह समझाया कि किस प्रकार दिन-रात की विषम जलवायु, चिलचिलाती धूप और कड़ाके की ठंड में देश की सीमाओं की अखंडता सुरक्षित रखी जाती है।
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रिट्रीट सेरेमनी का रोमांच: शाम के समय जवानों द्वारा आयोजित अनुशासित और ऊर्जावान बीटिंग रिट्रीट परेड को देखकर छात्रों ने भारत माता के जयकारे लगाए। परेड के दौरान जवानों की कदमों की ताल और चेहरे के आत्मविश्वास ने विद्यार्थियों के भीतर देशभक्ति का संचार कर दिया।
महात्मा गांधी स्कूल मालवाड़ा का शैक्षणिक भ्रमण: नडाबेट भारत-पाक सीमा और ढीमा कृष्ण मंदिर का किया अवलोकन
ढीमा का धरणीधर मंदिर: द्वापर युगीन आस्था और इतिहास
भ्रमण दल का दूसरा प्रमुख पड़ाव थराद के समीप स्थित ऐतिहासिक ढीमा गांव का धरणीधर भगवान कृष्ण मंदिर रहा।
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पौराणिक संदर्भ: मान्यता है कि जब भगवान श्रीकृष्ण मथुरा से द्वारिका की ओर प्रस्थान कर रहे थे, तब उन्होंने ढीमा की इस पावन भूमि पर विश्राम किया था। यहां स्थापित भगवान धरणीधर का विग्रह अद्वितीय माना जाता है।
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सांस्कृतिक विरासत: विद्यार्थियों ने मंदिर परिसर की पारंपरिक वास्तुकला, प्राचीन कलाकृतियों और स्थानीय लोकसंस्कृति को करीब से देखा व समझा। शिक्षकों ने उन्हें क्षेत्र के लोक-इतिहास और सामाजिक समरसता के बारे में विस्तार से जानकारी दी।
शिक्षकों व विद्यालय प्रशासन का विजन
प्रधानाचार्य श्री मुकेश कुमार जोशी ने कहा, "इस भ्रमण का उद्देश्य छात्रों को रेगिस्तानी भूगोल, सीमावर्ती संवेदनशीलता और गौरवशाली इतिहास से रूबरू कराना था। ऐसे आयोजनों से बच्चों में निर्णय लेने की क्षमता, टीम भावना और अनुशासन का विकास होता है।"
भ्रमण प्रभारी रमेश कुमार ने बताया कि इस प्रकार के व्यावहारिक अनुभव बच्चों की बौद्धिक और सामाजिक चेतना को विस्तार देते हैं। उन्होंने संकेत दिया कि विद्यालय भविष्य में भी ऐसे ज्ञानवर्धक दौरे आयोजित करता रहेगा।
मजबूत प्रबंधन और शिक्षकों का योगदान
दल के सफल संचालन में सह प्रभारी निमेश कुमार एवं संजू बिश्नोई का अहम योगदान रहा। छात्रा वर्ग की सुरक्षा व मार्गदर्शन की कमान शिक्षिका अंजना मीणा ने संभाली, जबकि छात्र वर्ग की अनुशासन व्यवस्था अमृतलाल, राजेश कुमार, जितेंद्र कुमार, कृष्ण कुमार और नरेन्द्र सिंह ने सुनिश्चित की। इस पूरे शैक्षणिक अभियान को सुगम बनाने में जसवंत कंवर सहित समस्त स्टाफ का सहयोग रहा।









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