जालोर/जालमपुरा। जालोर जिले के जालमपुरा की धरा पर भक्ति और श्रद्धा का अद्भुत संगम देखने को मिला, जहां जुझार खुम सिंह दहिया एवं मम्माई माताजी के नवनिर्मित भव्य मंदिर में मूर्ति प्राण-प्रतिष्ठा महोत्सव हर्षोल्लास के साथ संपन्न हुआ। धर्म और आस्था के इस महाकुंभ में समूचा क्षेत्र अध्यात्म के रंग में रंगा नजर आया। वैदिक मंत्रोच्चार और ढोल-नगाड़ों की थाप के बीच जब मूर्तियों की प्राण-प्रतिष्ठा की गई, तो माहौल भक्तिमय हो गया। सर्कल न्यूज़ नेटवर्क की इस विशेष रिपोर्ट में जानिए कि कैसे इस आयोजन ने न केवल आस्था की नींव मजबूत की, बल्कि समाज को एकजुटता का नया संदेश भी दिया।
श्रद्धा की ऐसी बयार, उमड़ा आस्था का सैलाब प्राण-प्रतिष्ठा के शुभ मुहूर्त पर मंदिर परिसर भक्तों की भीड़ से भरा रहा। अलसुबह से ही पूजा-अर्चना और हवन के साथ धार्मिक अनुष्ठान शुरू हुए, जिसमें क्षेत्रभर के श्रद्धालुओं ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। मूर्तियों के अभिषेक और स्थापना के दौरान जैसे ही शंखनाद हुआ, संपूर्ण जालमपुरा जयकारों से गूंज उठा। श्रद्धालुओं ने लंबी कतारों में लगकर दर्शन किए और जुझार खुम सिंह दहिया एवं मम्माई माताजी से लोक-कल्याण तथा सुख-समृद्धि की कामना की।

विपत्ति में ढाल बनता है हमारा इतिहास: टिकम सिंह राणावत कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत करते हुए भाजपा युवा नेता टिकम सिंह राणावत ने अपने ओजस्वी उद्बोधन में इतिहास के पन्नों को कुरेदा। उन्होंने जुझार खुम सिंह दहिया के बलिदान को नमन करते हुए कहा कि हमारा गौरवशाली इतिहास मातृभूमि, गायों और निर्बल की रक्षा के लिए लहू बहाने का रहा है। राणावत ने जोर देकर कहा कि 36 कौम के लोग आज भी इन घरानों पर इसलिए विश्वास करते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि संकट की घड़ी में ये परिवार सदैव उनके साथ खड़े मिलते हैं। उन्होंने कहा कि इसी विश्वास और भाईचारे की परंपरा को भावी पीढ़ी तक पहुंचाना हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है।
शिक्षा और जागरूकता: विकास की असली धुरी अपने संबोधन को आगे बढ़ाते हुए टिकम सिंह राणावत ने समाज के युवाओं और परिवारों को एक नई दिशा दिखाई। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल धार्मिक अनुष्ठान ही काफी नहीं हैं, बल्कि समाज को आधुनिक युग के अनुरूप ढालना भी अनिवार्य है। उन्होंने कहा, "समाज को शिक्षित और जागरूक बनाना आज के समय की सबसे बड़ी मांग है। जब समाज शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ेगा और राजनीतिक रूप से जागरूक होकर अपनी भागीदारी निभाएगा, तभी वास्तविक विकास संभव है।" उन्होंने सभी से अपील की कि आपसी मतभेद भुलाकर समाज और क्षेत्र के उत्थान के लिए एकजुट होकर कार्य करें।
आयोजन की खास झलकियां:
- पारंपरिक स्वागत: आयोजन समिति की ओर से पधारे हुए संत-महात्माओं, अतिथियों और वरिष्ठ आगेवानों का राजपूती परंपरा के अनुसार साफा और माला पहनाकर सम्मान किया गया।
- अतिथियों की गरिमामयी उपस्थिति: इस ऐतिहासिक अवसर पर वरिष्ठ आगेवान वरद सिंह पाथेडी, ऊक सिंह बावतरा सहित कई जनप्रतिनिधि और गणमान्य नागरिक मौजूद रहे, जिन्होंने मंदिर की भव्यता और अनुशासन की सराहना की।
- सामाजिक समरसता का संदेश: दहिया राजपूत समाज के साथ-साथ अन्य वर्गों के लोगों की उपस्थिति ने इस कार्यक्रम को सामाजिक समरसता का केंद्र बना दिया, जहाँ हर चेहरे पर उल्लास और हृदय में अटूट विश्वास था।
- व्यवस्थाओं का प्रबंधन: आयोजन समिति ने इतने बड़े जनसमूह के लिए भोजन, पेयजल और सुरक्षा की बेहतरीन व्यवस्थाएं सुनिश्चित की थीं, जिससे महोत्सव निर्बाध रूप से संपन्न हुआ।
यह प्राण-प्रतिष्ठा महोत्सव केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और संस्कारों के पुनरुद्धार का एक बड़ा माध्यम सिद्ध हुआ है। जालमपुरा के इस मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा आने वाली कई पीढ़ियों को त्याग, तपस्या और सामाजिक सेवा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती रहेगी।







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