सोरठ की धरा पर सरस्वती का अनूठा अनुष्ठान, विद्वानों ने खोली प्राचीन काव्य परंपराओं की परतें
गांधीनगर/ सुरेन्द्रनगर। नारद जयंती का पवित्र अवसर और सुरेन्द्रनगर के स्वामीनारायण गुरुकुल का प्रांगण। अवसर जितना पावन था, माहौल उतना ही साहित्यिक और ओजस्वी था। सुरेन्द्रनगर के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय तब जुड़ गया जब लोकसाहित्य परिवार के अध्यक्ष गिरीशभाई बापलभाई गढवी के कुशल मार्गदर्शन में एक दिवसीय 'डिंगल-पिंगल साहित्य शिविर' का भव्य आयोजन हुआ। पूज्य महंत स्वामी की छत्रछाया और मेजबानी में आयोजित इस शिविर ने मरु-गुर्जर संस्कृति की प्राचीन काव्य विधाओं को जीवंत कर दिया।

शिविर के मुख्य वक्ता के रूप में गांधीनगर से पधारे डिंगल-पिंगल के प्रकांड विद्वान नरपतदान आसिया ने अपनी अनवरत, गंभीर और ओजस्वी वाणी से समां बांध दिया। उन्होंने विभिन्न प्राचीन ग्रंथों के उदाहरण देते हुए डिंगल-पिंगल साहित्य की ऐसी बारीकियों को समझाया कि वहां उपस्थित सभी जिज्ञासु, अभ्यासी और साहित्य प्रेमी रस-तरबोर हो गए। नरपतदान आसिया ने अपनी जादुई प्रस्तुति से साबित कर दिया कि आज के आधुनिक दौर में भी हमारी लोक-परंपराओं की जड़ें कितनी मजबूत हैं।
इसके साथ ही, स्थानीय लोकसाहित्यकार गिरीशदान गढवी ने छंद शास्त्र पर प्रामाणिक उदाहरणों और अकाट्य तर्कों के साथ एक अत्यंत उत्तम एवं ज्ञानवर्धक वक्तव्य प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि कैसे मात्रिक और वर्णिक छंदों का सही तालमेल कविता में प्राण फूंक देता है।

क्या है डिंगल और पिंगल? छंद-दोहे का अनूठा संसार
शिविर में मुख्य रूप से चर्चा का केंद्र रहीं दो प्राचीन शैलियों को समझना हर साहित्य प्रेमी के लिए बेहद जरूरी है:
- डिंगल (वीर रस की गर्जना): यह मुख्यतः राजपूताना और गुजरात के चारण गढ़वी कवियों की वीर रस प्रधान युद्ध-भाषा रही है। डिंगल में कठोर वर्णों का प्रयोग होता है, जो सुनने वाले के रोंगटे खड़े कर दे। तलवारों की खनक और घोड़ों की टापों की आवाज डिंगल के छंदों में साफ सुनाई देती है।
- पिंगल (शृंगार और भक्ति का प्रवाह): डिंगल के विपरीत पिंगल भाषा राव, ब्रहाभट्ट और बारोट कवियों की रही। यह अत्यंत कोमल, मधुर और कर्णप्रिय होती है। इसमें ब्रजभाषा का प्रभाव अधिक होता है। इसका उपयोग मुख्यतः शृंगार, भक्ति और शांत रस की रचनाओं के लिए किया जाता है।
- छंद और दोहा: छंद काव्य का वह अनुशासन है जो उसे गति, यति और लय प्रदान करता है। दोहा अर्ध-सम मात्रिक छंद है, जिसके पहले और तीसरे चरण में $13-13$ मात्राएं तथा दूसरे और चौथे चरण में $11-11$ मात्राएं होती हैं। डिंगल-पिंगल की रीढ़ यही छंद और दोहे हैं, जिनके बिना शौर्य और प्रेम की अभिव्यक्ति अधूरी है।
नरपतदान आसिया को जाता है मुख्य श्रेय
इस पूरे आयोजन को वैचारिक ऊंचाई देने और युवा पीढ़ी को इस क्लिष्ट विधा से जोड़ने का मुख्य श्रेय निस्संदेह नरपतदान आसिया को जाता है। उन्होंने केवल व्याख्यान नहीं दिया, बल्कि डिंगल के 'गीत' को गाकर सुनाया, जिससे पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। उनकी इस सेवा के लिए सुरेन्द्रनगर का साहित्य जगत उनका सदैव ऋणी रहेगा।

दिग्गजों की उपस्थिति ने बढ़ाई गरिमा
इस साहित्यिक महाकुंभ को सफल बनाने में झालावाड़ के लोक साहित्य के संरक्षक भूपेन्द्रभाई दवे साहब, सी. टी. टुंडिया साहब, गोपाल बारोटजी, अशोकभाई सोनी, डॉ. मेवाडा साहब, मौलिक पाठक, सी. बी. शाह और बद्रीप्रसाद भट्ट साहब जैसी सम्मानीय विभूतियों का विशेष योगदान रहा।
कार्यक्रम के अंत में दूर-दूर से आए लोकसाहित्य प्रेमियों ने इस आयोजन को बेहद गरिमामय और सफल बनाया। उपस्थित जनसमुदाय को देखकर यह साफ था कि हमारी प्राचीन संस्कृति और डिंगल-पिंगल जैसी अनमोल विरासत को सहेजने वाले पारखियों की आज भी कोई कमी नहीं है।







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