कांग्रेस सरकार द्वारा घोषित प्रदेश के पहले भालू अभयारण्य में सुरक्षित हुआ एक और कुनबा; जांबाज रेस्क्यू ने फिर जीता जनता का दिल।
विशेष रिपोर्ट: विरासत और विकास का संगम
जसवंतपुरा/जालौर। राजस्थान का 'मिनी माउंट' कहा जाने वाला जसवंतपुरा क्षेत्र आज एक बार फिर अपनी जांबाजी और समृद्ध वन्यजीव विरासत के लिए चर्चा में है। सुंधा माता मार्ग पर सड़क पर उतरे एक भालू का सुरक्षित रेस्क्यू केवल एक विभागीय कार्यवाही नहीं है, बल्कि उस दूरगामी सोच की सफलता है जिसकी नींव साल 2011 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने रखी थी। 2011 में इस क्षेत्र को प्रदेश का पहला भालू अभयारण्य (Bear Sanctuary) घोषित किया गया था, और आज वही फैसला यहाँ के पर्यटन में गुणात्मक वृद्धि का सबसे बड़ा आधार बना है।
रेस्क्यू ऑपरेशन: जब साहस ने जीती जंग
जसवंतपुरा थाने के समीप दिनदहाड़े भालू के विचरण से मची अफरातफरी के बीच पूरण नाका इंचार्ज प्रभु राम जाट एक रक्षक बनकर उभरे। वन अधिकारी के.के. परमार के मार्गदर्शन में प्रभु राम जाट और उनकी टीम ने अपनी जान जोखिम में डालकर करीब आधे घंटे की कड़ी मशक्कत के बाद भालू को सुरक्षित पिंजरे में कैद किया। यह रेस्क्यू ऑपरेशन दर्शाता है कि 15 साल पहले शुरू हुआ संरक्षण का सफर आज कितना परिपक्व हो चुका है।

पर्यटन और संरक्षण का बदलता स्वरूप
2011 की ऐतिहासिक घोषणा के बाद से ही सुंधा माता और जसवंतपुरा की पहाड़ियों में भालुओं की संख्या में प्रचुर वृद्धि हुई है। पूर्व में भी हुए दर्जनों सफल रेस्क्यू ऑपरेशंस ने पर्यटकों के मन में सुरक्षा का भाव पैदा किया है, जिससे यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं और वन्यजीव प्रेमियों की संख्या लगातार बढ़ रही है।

आज जसवंतपुरा न केवल एक धार्मिक केंद्र है, बल्कि वन्यजीव प्रेमियों के लिए 'इको-टूरिज्म' का एक बड़ा हब बन चुका है।







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