जल ही जीवन है: 8 साल से प्यासी सागी और खारी नदियों के पुनर्जीवन की आस में ग्रामीणों ने की वरुणावतार की आराधना
भीनमाल (राजस्थान):
प्रकृति की अराधना और आस्था का अद्भुत दृश्य उस समय देखने को मिला जब भीनमाल के समीप स्थित आलड़ी गांव के ग्रामीणों ने सूखे पड़े जलस्रोतों को जीवित करने की अनोखी पहल की। क्षेत्र की जीवनरेखा कही जाने वाली सागी और खारी नदियां पिछले 8 वर्षों से सूखी पड़ी हैं। भू-जल स्तर लगातार गिरने और बोरवेल व नलकूपों के जवाब दे जाने से अन्नदाताओं के चेहरों पर चिंता की लकीरें छा गई थीं। ऐसे में मवेशियों के चारे-पानी के संकट से जूझ रहे ग्रामीणों ने प्रकृति के देवता को मनाने के लिए आस्था का दामन थामा और विधि-विधान से नदी पूजन किया।
ढोल-नगाड़ों और जयकारों के साथ उमड़ा जनसैलाब
मंगलवार को आलड़ी गांव के समस्त ग्रामवासी एकजुट होकर गाजे-बाजे और ढोल-नगाड़ों की गूंज के बीच सागी-खारी नदी के तट पर पहुंचे। कार्यक्रम का माहौल पूरी तरह भक्तिमय था।

- मांगलिक गान: माता-बहनों ने पारंपरिक मंगल गीत गाए।
- जयकारे: 'गंगा मैय्या की जय' और 'वरुण देव की जय' के नारों से पूरा क्षेत्र गूंज उठा।
- वैदिक मंत्रोच्चार: ब्राह्मणों के मंत्रोच्चारण के बीच नदी में मां गंगा को चुनरी ओढ़ाई गई।
- विशेष अनुष्ठान: कुंवारी और छोटी बच्चियों के हाथों से नदी पूजन करवाकर वरुण देव और इंद्रदेव से क्षेत्र में मूसलाधार बारिश और नदियों में जल प्रवाह की प्रार्थना की गई।
गौ पुत्र हरीश कुमार पुरोहित (आलड़ी) ने जानकारी देते हुए बताया कि इस धार्मिक अनुष्ठान में गांव के प्रत्येक वर्ग ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और सामूहिक रूप से क्षेत्र की खुशहाली की कामना की।

विशेष प्रसंग: क्या नदी पूजन से लौट आता है नदियों का पानी? जानिए इसकी पौराणिक और सांस्कृतिक महिमा
भारतीय सनातन संस्कृति में नदियों को केवल जल का स्रोत नहीं, बल्कि देवी (लोकमाता) का दर्जा दिया गया है। जब नदियां सूखती हैं या अकाल के हालात बनते हैं, तो सामूहिक प्रार्थना (यज्ञ, अनुष्ठान और पूजन) की परंपरा सदियों पुरानी है।
इस अनुष्ठान के पीछे छिपे हैं गहरे मायने:
- सामूहिक चेतना और जल संरक्षण: जब पूरा गांव मिलकर नदी की पूजा करता है, तो यह जल स्रोतों के प्रति संवेदनशीलता और उनके संरक्षण का सामूहिक संकल्प बन जाता है।
- प्रकृति के प्रति कृतज्ञता: हिन्दू शास्त्रों के अनुसार, वरुण देव और इंद्र देव जल के देवता हैं। उनकी आराधना से न केवल आध्यात्मिक बल मिलता है, बल्कि यह वर्षा ऋतु के आगमन के लिए प्रकृति को पुकारने का माध्यम भी है।
- मनोवैज्ञानिक संबल: भीषण सूखे और आर्थिक संकट के समय ऐसा धार्मिक अनुष्ठान ग्रामीणों में सकारात्मक ऊर्जा और उम्मीद का संचार करता है, जिससे वे संकट का मुकाबला एकजुट होकर करने की शक्ति पाते हैं।
समाचार संकलन एवं प्रेषण: रविंद्र सिंह उमट







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