— सांचौर में जुटी प्रबुद्ध जनों की टोली, 23 जून को होगा कुसुमदेवी भूरसिंहजी राव बोरली आदर्श विद्या मंदिर के नवीन भवन का ऐतिहासिक शिलान्यास
— क्षेत्र प्रचारक निंबाराम और राज्यसभा सांसद डॉ. सतीश पूनियां की गरिमामयी उपस्थिति में रचेगा नया इतिहास; भामाशाहों के त्याग और समर्पण की चौतरफा सराहना
सांचौर। मरुधरा की पावन धरा पर शिक्षा के उजियारे और संस्कारों के सिंचन की गौरवमयी परंपरा में एक और स्वर्णिम अध्याय जुड़ने जा रहा है। चितलवाना तहसील के सुंथड़ी ग्राम में आगामी 23 जून 2026 को "कुसुमदेवी भूरसिंहजी राव बोरली आदर्श विद्या मंदिर" के नवीन भवन का भव्य शिलान्यास समारोह आयोजित किया जाएगा। इस ऐतिहासिक अनुष्ठान की तैयारियों को लेकर मंगलवार को सांचौर के सुभाष नगर स्थित आदर्श विद्या मंदिर परिसर में एक अति-महत्वपूर्ण बैठक का आयोजन किया गया, जिसमें समूचे क्षेत्र के प्रबुद्ध जनों, समाजसेवियों और कार्यकर्ताओं ने हुंकार भरते हुए व्यवस्थाओं का विभाजन किया और तैयारियों को अंतिम रूप देना प्रारंभ कर दिया।

दिग्गजों का लगेगा मेला, सुंथड़ी की धरा बनेगी गवाह
आगामी 23 जून को आयोजित होने वाले इस विराट शिलान्यास समारोह में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्षेत्र प्रचारक निंबाराम जी एवं राज्यसभा सांसद डॉ. सतीश पूनियां मुख्य अतिथि और मार्गदर्शक के रूप में उपस्थित रहेंगे। उनकी गरिमामयी उपस्थिति इस आयोजन को और अधिक भव्यता प्रदान करेगी। मंगलवार को हुई बैठक में कार्यक्रम की रूपरेखा तय कर अलग-अलग व्यवस्थाओं के लिए टोलियां और समितियां गठित की गईं। कार्यकर्ताओं ने गांव-गांव, ढाणी-ढाणी जाकर पीले चावल बांटने और आमजन को इस ऐतिहासिक पल का साक्षी बनने के लिए जनसंपर्क अभियान शुरू कर दिया है।

भामाशाहों का अनुकरणीय त्याग: ग्रामीण अंचल को मिलेगा विद्या का मंदिर
बैठक में उपस्थित वक्ताओं ने भामाशाह परिवार के रूप में श्रवणसिंह एवं सतीशसिंह पुत्र मदरूपसिंह राव बोरली के इस अनुपम और भगीरथ प्रयास की मुक्त कंठ से सराहना की। वक्ताओं ने कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में इस परिवार द्वारा दिया जा रहा योगदान न केवल अनुकरणीय है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का पुंज बनेगा। ग्रामीण अंचल के बच्चों को अपने ही घर के समीप गुणवत्तापूर्ण और संस्कारयुक्त शिक्षा मिल सके, इस संकल्प के साथ दिया गया यह दान समाज के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा।
सर्वसमाज की सहभागिता: अंतिम छोर के बालक तक पहुंचेगा ज्ञान का उजाला
विशेष उल्लेखनीय है कि सुंथड़ी और आसपास का यह क्षेत्र अनुसूचित जाति सहित अन्य पिछड़ा समुदाय की बहुलता वाला क्षेत्र है। विद्या भारती के सिद्धांतों के अनुरूप इस विद्यालय की स्थापना से इस पिछड़े और वंचित क्षेत्र के प्रत्येक बालक-बालिका तक संस्कारित और आधुनिक शिक्षा की पहुंच सुलभ होगी। बैठक में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि समाज के हर वर्ग, अभिभावकों और प्रबुद्ध जनों से व्यक्तिगत संपर्क साधकर इस शिलान्यास समारोह में उनकी शत-प्रतिशत सहभागिता सुनिश्चित की जाएगी।
इस बैठक में राणा देवीसिंह सुराचंद, भामाशाह श्रवणसिंह राव बोरली, सतीशसिंह राव, अजय कुमार, वन्नेसिंह गोहिल, प्रकाश पुरोहित खिरोडी, अंबाराम पुरोहित, सांवलाराम माली, जानकी प्रसाद गुप्ता, ईश्वरसिंह राव, अर्जुनसिंह सरवाणा, भावेश त्रिवेदी, उदाराम वैष्णव, ओखाराम, बंशीलाल खोरवाल, देवराज चौधरी, मानाराम, संपतराज टाक, कांतिलाल सूर्या, चौथाराम कोली, दिनेशचंद गौड़, पहाडसिंह राव एवं सांवलाराम सुथार सहित भारी संख्या में देश-समाज की चिंता करने वाले कार्यकर्ता और मातृभक्त उपस्थित रहे। सभी ने एक स्वर में इस कार्यक्रम को भव्य, दिव्य और ऐतिहासिक बनाने का अटूट संकल्प दोहराया।
आदर्श विद्या मंदिर संस्थान: एक परिचय
विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान से संबद्ध "आदर्श विद्या मंदिर" केवल किताबी ज्ञान देने वाले स्कूल नहीं, बल्कि 'सा विद्या या विमुक्तये' (विद्या वह है जो मुक्ति दिलाए) के ध्येय वाक्य को जीने वाले राष्ट्र निर्माण के केंद्र हैं।
स्थापना और उद्देश्य: विद्या भारती की शुरुआत सन् 1952 में गोरखपुर (उत्तर प्रदेश) से हुई थी। इसका मुख्य उद्देश्य एक ऐसी युवा पीढ़ी का निर्माण करना है जो हिंदुत्व के प्रति निष्ठावान हो, राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत हो, शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक रूप से पूर्ण विकसित हो और जीवन की चुनौतियों का सामना हंसते-हंसते कर सके।
संस्थान की मुख्य विशेषताएं:
- पंचपदी शिक्षण पद्धति: यहाँ शिक्षा रटवाने के बजाय पांच चरणों—अधीत (पढ़ना), बोध (समझना), अभ्यास, प्रयोग और प्रसार के माध्यम से दी जाती है।
- संस्कार पक्ष (पंचमुखी शिक्षा): केवल किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए शारीरिक, योग, संगीत, संस्कृत और नैतिक-आध्यात्मिक शिक्षा अनिवार्य रूप से पाठ्यक्रम का हिस्सा होती है।
- अंतिम छोर तक पहुंच (सेवा कार्य): विद्या भारती विशेष रूप से जनजाति, ग्रामीण, झुग्गी-झोपड़ियों और सुदूर सीमावर्ती क्षेत्रों में 'संस्कार केंद्रों' और 'आदर्श विद्या मंदिरों' के माध्यम से शिक्षा पहुंचाती है, ताकि सुंथड़ी जैसे अनुसूचित जाति बहुल क्षेत्रों के बच्चों को भी देश की मुख्यधारा से जोड़ा जा सके।
- राष्ट्र प्रथम की भावना: यहाँ प्रतिदिन का प्रारंभ वंदना और देशभक्ति के गीतों से होता है, जिससे बालकों के मन में अपनी संस्कृति, पूर्वजों और राष्ट्र के प्रति अगाध श्रद्धा उत्पन्न होती है।







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