जालोर/रानीवाडा। जालोर की ऐतिहासिक धरा पर स्थित रानीवाड़ा तहसील का मंडारडी गांव आज आस्था और शौर्य के अभूतपूर्व संगम का साक्षी बना। ३०० वर्ष पुराने गौरवशाली इतिहास को जीवंत करते हुए सती शिरोमणि रतन कंवर राव सिरदार और वीर जुझार भेरूसिंह जी राव सिरदार के नवनिर्मित मंदिर में मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा समारोहपूर्वक संपन्न हुई।

सर्कल न्यूज़ नेटवर्क के अनुसार, इस पावन अवसर पर ३६ कौम के लोग, सती माता के वंशज और देवासी समाज की भारी उपस्थिति रही, जिससे पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया।


आध्यात्मिक सानिध्य और गणमान्य अतिथियों की उपस्थिति
महोत्सव का आयोजन श्री आपेश्वर महादेव मठ सेवाड़िया के मठाधीश महंत रतन भारती महाराज और उनके शिष्य संत रविंद्र भारती महाराज के पावन सानिध्य में किया गया।

इस धार्मिक अनुष्ठान में स्थानीय विधायक रतन देवासी ने भी शिरकत की। श्रद्धा के इस महाकुंभ में भाग लेते हुए विधायक देवासी ने मंदिर परिसर की गरिमा बढ़ाने हेतु चारों ओर चारदीवारी निर्माण और इंटरलॉकिंग ब्लॉक लगवाने की घोषणा की, जिसका ग्रामीणों ने हर्षध्वनि के साथ स्वागत किया।

शौर्य और सत्य का इतिहास: जब अधर्म के आगे नहीं झुके राव सरदार
मंडारडी का इतिहास त्याग और बलिदान की अमिट स्याही से लिखा गया है। संवत् १७८० के उस दौर में, जब तत्कालीन शासकों ने वड़ंग गौत्र के जागीरदार रावों को उनकी पुश्तैनी 'सांसण' भूमि खाली करने का अन्यायपूर्ण आदेश दिया, तब रावों ने झुकने के बजाय संघर्ष चुना।
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इसी भीषण युद्ध में माता रतन कंवर राव सिरदार ने अपने सतीत्व और कुल की मर्यादा हेतु प्राणों की आहुति दी। वहीं, भेरूसिंहजी राव सिरदार ने वीरता की पराकाष्ठा पार करते हुए शीश कटने के बाद भी धड से युद्ध किया और 'जुझार' पद प्राप्त कर लोक देवता के रूप में प्रतिष्ठित हुए।

दोहा:
शीश पड्या पण धड लढ्या, मंडारडी रे मैदान।
भेरूजी जुझार बण, राख्यो रावों रो मान।।त्याग की भूमि से अटूट आस्था का रिश्ता
ऐतिहासिक घटना के पश्चात मंडारडी के वड़ंग सेवारसा गौत्र के रावों ने गांव का त्याग कर दिया था। आज उनके वंशज मनधर, अनादरा, आबूरोड और करवाड़ा जैसे क्षेत्रों में निवास करते हैं, जो इस विशेष अवसर पर अपनी कुलदेवी और पूर्वज के चरणों में शीश नवाने पहुंचे। मान्यता है कि माता की भभूत और जुझारजी की अरज से आज भी दुख-व्याधियां दूर होती हैं और निसंतान दंपत्तियों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

भविष्य की ओर: आस्था का नया केंद्र
मंडारडी का यह मंदिर अब केवल एक पूजा स्थल नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए त्याग और धर्म की प्रेरणा का केंद्र बन गया है। आज की प्राण प्रतिष्ठा ने यह सिद्ध कर दिया कि समय भले ही बीत जाए, लेकिन सत्य और शौर्य के प्रतीक सदा अमर रहते हैं। ३६ कौम की एकता और भक्ति ने इस उत्सव को मारवाड़ के इतिहास में एक स्व म अध्याय के रूप में दर्ज करा दिया है। सती माता रतन कंवर राव और वीर जुझार भेरूसिंहजी राव सिरदार की यह अमर गाथा अब राजस्थान की सीमाओं को लांघकर गुजरात और अन्य प्रदेशों के भक्तों को भी अपनी ओर आकर्षित कर रही है।

जालोर की तप्त धरा पर मंडारडी गांव की इस पावन गाथा ने आज फिर सिद्ध कर दिया कि जहाँ सत और शक्ति का वास होता है, वहाँ काल भी नतमस्तक हो जाता है। सती रतन कंवर और भेरूसिंहजी जुझार के ये मंदिर आने वाले समय में न्याय और अदम्य साहस के जीवंत प्रतीक बने रहेंगे।







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