रानीवाड़ा / सांचौर। रानीवाड़ा कस्बे में बड़गांव रोड स्थित राजस्थान राज्य पथ परिवहन निगम (रोडवेज) के बस स्टैंड की लगभग 100 करोड़ रुपये की बेशकीमती सार्वजनिक भूमि को लेकर चल रहे विवाद में एक बड़ा कानूनी खुलासा हुआ है।
सुबह इस मामले को लेकर खबर सामने आई थी कि 1988 में स्थापित इस बस स्टैंड की जमीन को लावारिस और बंद बताकर कूट रचित दस्तावेजों के जरिए भू-माफियाओं द्वारा हड़पने की कोशिश की जा रही है। इस पर सांचौर पंचायत समिति के पूर्व प्रधान एवं पूर्व उप जिला प्रमुख नरेंद्र कुमार विश्नोई ने सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों के जरिए चिंता जाहिर करते हुए सरकार व जिला प्रशासन से जमीन बचाने की गुहार लगाई थी।
खबर प्रसारित होने के बाद राजस्थान रोडवेज के अधिवक्ता ललितसिंह राजपुरोहित ने इस पूरे मामले में न्यायालय अतिरिक्त जिला कलेक्टर, सांचौर (पीठासीन अधिकारी प्रकाशचन्द्र अग्रवाल, आर.ए.एस.) द्वारा 12 अगस्त 2026 को पारित निर्णय की प्रति सार्वजनिक की है। कोर्ट के इस फैसले से साफ हो गया है कि इस जमीन को निजी खाते में दर्ज करवाने की कोशिशों को न्यायालय पहले ही सिरे से खारिज कर चुका है और जमीन पर सार्वजनिक रोडवेज बस स्टैंड का हक बरकरार रखा गया है।
सुबह क्या उठा था मामला? (पूर्व प्रधान नरेंद्र विश्नोई की चिंता)
सुबह की रिपोर्ट में सांचौर के पूर्व प्रधान नरेंद्र कुमार विश्नोई (मो. 9413655501) के हवाले से यह गंभीर सवाल उठाया गया था कि वर्ष 1988 में स्वर्गीय पूर्व मंत्री रघुनाथ विश्नोई के फार्म के सामने दानदाताओं के सहयोग से रानीवाड़ा को नए बस डिपो की सौगात दी गई थी। राजस्थान सरकार के आदेश पर यह जमीन रोडवेज को सौंपी गई थी, जहां भवन, प्रतीक्षालय और बाउंड्री का निर्माण हुआ तथा वर्षों तक बसें चलीं।
पूर्व प्रधान ने आरोप लगाया था कि लंबे समय से बसों का संचालन बंद होने और विभागीय उपेक्षा का फायदा उठाकर कुछ भू-माफिया कूट रचित दस्तावेज तैयार कर इस 100 करोड़ की जमीन को खुर्द-बुर्द करने की फिराक में हैं। यहां तक कि पिछले दिनों जमीन पर कब्जे की नीयत से बैनर लगाने की कोशिश भी की गई थी, जिसे ग्रामीणों ने विफल किया था। उन्होंने स्थानीय जनप्रतिनिधियों (वर्तमान विधायक रतन देवासी एवं पूर्व विधायक नारायण सिंह देवल) की उदासीनता पर सवाल उठाते हुए जनांदोलन की चेतावनी दी थी।
अदालत में क्या था पूरा मामला?
न्यायालय अतिरिक्त जिला कलक्टर सांचौर में विचाराधीन प्रकरण संख्या 60/2025 (जसीराम पुत्र नागजीराम के विधिक वारिसान दाड़मी आदि बनाम ग्राम विकास अधिकारी रानीवाड़ा कलां, सरपंच, तहसीलदार एवं रोडवेज प्रबंधक) के अनुसार:
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अपीलार्थी पक्ष का दावा:
अपीलार्थी (स्व. जसीराम के वारिसान) ने राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम की धारा 75 के तहत अपील दायर कर कहा था कि पुराना खसरा नंबर 534 (नया खसरा नंबर 1214, रकबा 1.86 हेक्टेयर) में उनके पिता का 1/23 हिस्सा (लगभग 980 वर्गगज) था। उन्होंने 1988 में इसे आवासीय/वाणिज्यिक प्रयोजनार्थ संपरिवर्तित कराने की अर्जी दी थी। उनका आरोप था कि पटवारी द्वारा नामांतरण संख्या 7 (दिनांक 03.06.1989) दर्ज करते समय इसे उनके नाम दर्ज करने के बजाय गलती से 'ग्राम पंचायत' के खाते में दर्ज कर दिया गया। इसलिए 32-33 साल पुराने नामांतरण को दुरुस्त कर जमीन उनके नाम दर्ज की जाए।
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रोडवेज की कड़ी आपत्ति:
राजस्थान राज्य पथ परिवहन निगम, जालोर आगार की ओर से अधिवक्ता ललितसिंह राजपुरोहित ने पक्ष रखते हुए स्पष्ट किया कि:
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विवादित भूमि पर वर्ष 1988 से यानी लगभग 38 वर्षों से रोडवेज बस स्टैंड संचालित है।
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यह जमीन स्व. जसीराम व नरसा पुत्र छोगाजी सहित अन्य दानदाताओं द्वारा दिनांक 07.10.1988 और 04.11.1988 को रोडवेज बस स्टैंड के निर्माण हेतु विधिवत सहमति व नक्शे के साथ समर्पित (दान) की गई थी।
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तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री द्वारा राजस्थान के मुख्यमंत्री से पत्राचार और जिला प्रमुख जालोर व ग्राम पंचायत की सहमति के बाद सरकारी मद से यहां बस स्टैंड का निर्माण करवाया गया।
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दिनांक 22.10.1989 को विधिवत सार्वजनिक समारोह में इसका शिलान्यास/उद्घाटन हुआ था, जिसका शिलालेख आज भी मौके पर मौजूद है।
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स्व. जसीराम का निधन 26.10.2019 को हुआ, यानी उनके जीवनकाल में कभी कोई आपत्ति नहीं की गई। उनके निधन के बाद दशकों पुराने नामांतरण को चुनौती देना पूरी तरह कालबाधित और गलत नीयत से उठाया गया कदम है।
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न्यायालय का फैसला: अपील निराधार, सार्वजनिक हित सर्वोपरि
पीठासीन अधिकारी प्रकाशचन्द्र अग्रवाल (आर.ए.एस.) ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और राजस्व रिकॉर्ड व पुराने पत्राचारों का अवलोकन करने के बाद फैसला सुनाया:
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अभिलेखों से स्पष्ट प्रमाणित होता है कि खसरा नंबर 534 में लगभग 2 बीघा जमीन आम जनता और यात्रियों की सुविधा के लिए रोडवेज बस स्टैंड हेतु निःशुल्क समर्पित की गई थी।
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बस स्टैंड का निर्माण किसी निजी व्यक्ति के लाभ के लिए नहीं, बल्कि सार्वजनिक परिवहन और जनहित के लिए हुआ था।
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राजस्व रिकॉर्ड, सरकारी पत्राचार और मौके पर शिलालेख यह सिद्ध करते हैं कि जमीन का लंबे समय से सार्वजनिक उपयोग हो रहा है।
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अपीलार्थी पक्ष अधीनस्थ राजस्व रिकॉर्ड में कोई तथ्यात्मक या विधिक त्रुटि साबित करने में पूरी तरह असमर्थ रहा।
अदालत ने दिनांक 12.08.2026 को अपीलार्थीगण की अपील को पूर्णतः निराधार व सारहीन मानते हुए खारिज कर दिया।
निष्कर्ष: जनता की सजगता और कोर्ट के फैसले के बाद अब रोडवेज पर टिकी नजरें
कोर्ट के इस स्पष्ट निर्णय से यह साबित हो गया है कि कानूनी रूप से यह जमीन सार्वजनिक बस स्टैंड के लिए ही समर्पित है और किसी भी निजी दावे की गुंजाइश को अदालत ने नकार दिया है।
अब क्षेत्रवासियों और पूर्व प्रधान नरेंद्र कुमार विश्नोई द्वारा उठाई गई मुख्य मांग यह है कि जब जमीन रोडवेज के लिए सुरक्षित है, तो परिवहन निगम अपनी कुंभकर्णी नींद से जागे। डिपो परिसर में बसों का नियमित ठहराव, कर्मचारियों की पुनर्नियुक्ति और आधुनिक बस अड्डे का सुचारु संचालन तुरंत शुरू किया जाए, ताकि यह सार्वजनिक संपत्ति किसी भी साजिश या उपेक्षा का शिकार न बने।









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