लवणीय पानी का डंक, मुआवजे पर मौन और हक की लड़ाई; संयुक्त किसान मोर्चा ने शासन-प्रशासन को दी सीधी चेतावनी
लालासर/सांचौर। आजादी के 78 बरस बाद भी देश का पेट भरने वाला अन्नदाता अपने हक के लिए सड़कों पर उतरने को मजबूर है। सांचौर और चितलवाना क्षेत्र के किसानों की सुलगती समस्याओं को लेकर संयुक्त किसान मोर्चा के बैनर तले लालासर गांव में एक विशाल बैठक का आयोजन किया गया। रूपा राम गोदारा की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में सैकड़ों किसानों ने हुंकार भरी। मोर्चा ने आगामी 16 जून को अतिरिक्त जिला कलेक्टर कार्यालय सांचौर के सामने प्रस्तावित विशाल धरने की रणनीति तैयार की है, जिसमें लालासर गांव से ही सैकड़ों किसान ट्रैक्टर-ट्रॉलियों के साथ कूच करेंगे।

गांव-गांव बांटे जा रहे पीले चावल
मोर्चा के जिला अध्यक्ष ईशराराम बिश्नोई ने बताया कि सांचौर और चितलवाना क्षेत्र के किसानों में प्रशासन के रवैये को लेकर भारी आक्रोश है। 16 जून के धरने को ऐतिहासिक बनाने के लिए 'किसान जागृति अभियान' के तहत गांव-गांव जाकर पीले चावल बांटकर किसानों को आमंत्रित किया जा रहा है। बिश्नोई ने कहा:
"जब तक स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट के आधार पर C2+50% फार्मूले से फसलों के दाम नहीं मिलते, बिजली-पानी की किल्लत दूर नहीं होती और फसल बीमा के नाम पर बैंकों का घपला बंद नहीं होता, तब तक यह लड़ाई थमेगी नहीं।"
करोड़ों का मुआवजा अटका, 'पोर्टल और बजट' का बहाना
बैठक में किसानों के दर्द को बयां करते हुए राजस्थान किसान सभा (चितलवाना) के अध्यक्ष भाखरा राम साऊ ने कहा कि 'बिपरजॉय' तूफान और भारी जलभराव के कारण खेतों में लवणीय पानी जमा हो गया है, जिससे उपजाऊ जमीन बंजर हो चुकी है। सरकार को तुरंत संपूर्ण कर्ज माफी और खेत खराबे का मुआवजा देना चाहिए।
वहीं, जिला अध्यक्ष विरद सिंह चौहान और मक्का राम चौधरी ने तीखे तेवर अपनाते हुए कहा कि चितलवाना तहसील का करीब 88 करोड़ रुपये का फसल खराबा आदान अनुदान साल 2022 से बकाया है। अधिकारी कभी पोर्टल तो कभी बजट का बहाना बनाकर फाइलें अटका रहे हैं।
नर्मदा का पानी लूणी नदी में बेकार बहाया, नेहड़ में पीने के पानी की किल्लत
किसानों ने सरकार की दोहरी नीति पर भी कड़े सवाल उठाए। एक तरफ सरकार 'वंदे गंगा जल' के नाम पर जल संरक्षण का ढिंढोरा पीट रही है, वहीं दूसरी तरफ 22 मई को नहर का क्लोजर पूरा होने के बाद सांचौर और बाड़मेर के हिस्से का कीमती पानी लूणी नदी में व्यर्थ बहाया जा रहा है। चिलचिलाती गर्मी में नेहड़ क्षेत्र के गांवों में पीने के पानी का हाहाकार मचा है।
पूनमा राम बिश्नोई (हेमागुड़ा) ने मांग की कि नर्मदा नहर परियोजना के रिनोवेशन की 2 करोड़ की डीपीआर किसानों की राय से बनाई जाए और हेमागुड़ा व मेघावा-वीरावा जैसे अनकमांड क्षेत्रों को कमांड एरिया से जोड़कर हर खेत तक पानी पहुंचाया जाए।
सोलर प्लांट के नाम पर उजाड़े जा रहे आशियाने, निजीकरण का विरोध
विरद सिंह चौहान ने एक और गंभीर मुद्दा उठाते हुए बताया कि नेहड़ क्षेत्र के कुकड़िया, आकोड़िया और खेजड़ियाली गांवों में निजी सौर ऊर्जा कंपनियां गरीब किसानों के घर उजाड़ने पर आमादा हैं। जिन किसानों को साल 2001 में सरकार ने जमीनें आवंटित की थीं, जहां उनके इंदिरा आवास बने हैं और बिजली कनेक्शन हैं, उन्हें बेदखल कर रास्ते रोके जा रहे हैं। मोर्चा ने इसकी कड़े शब्दों में निंदा की और निजीकरण के खिलाफ आर-पार की लड़ाई का ऐलान किया। प्रवक्ता लादूराम भादू ने किसानों के लिए 10,000 रुपये मासिक पेंशन की भी पुरजोर मांग की।
इन गगनभेदी नारों से गूंजा लालासर
बैठक के दौरान किसानों का जोश सातवें आसमान पर था। पूरा परिसर इन नारों से गूंज उठा:
- हम हमारा हक मांगते - नहीं किसी से भीख मांगते!
- खेत हमारा कानून तुम्हारा - नहीं चलेगा, नहीं चलेगा!
- पानी हमारा कब्जा तुम्हारा - नहीं चलेगा, नहीं चलेगा!
- माल हमारा भाव तुम्हारा - नहीं चलेगा, नहीं चलेगा!
- लड़ेंगे-जीतेंगे, इंकलाब जिंदाबाद!
लालासर में किसान सभा की ग्राम इकाई का गठन
इस मौके पर संगठन की मजबूती के लिए राजस्थान किसान सभा की लालासर ग्राम इकाई का निर्विरोध गठन किया गया और पदाधिकारियों को किसान हित में काम करने की शपथ दिलाई गई:
| पद | नाम |
| संरक्षक | रूपा राम गोदारा |
| अध्यक्ष | किशन लाल गोदारा |
| सचिव | हनुमाना राम गोदारा, सोहन लाल खिचड़, रतन लाल खिचड़ |
| कोषाध्यक्ष | हनुमाना राम सियाक |
सक्रिय सदस्य: वगता राम खीचड़, गंगा राम गोदारा, देराम खिलेरी, भागीरथ गोदारा, उदा राम साऊ, किशन लाल S, मोहन लाल सारण, रूपाराम सियाक, मूला राम खिचड़, रूपा राम गोदारा, कालू राम H गोदारा और गंगाराम गोदारा।
कार्यक्रम का संचालन: लादू राम भादू (जिला प्रवक्ता, संयुक्त किसान मोर्चा सांचौर) द्वारा किया गया।
ब्लॉग विशेष टिप्पणी: सांचौर का यह किसान आंदोलन आने वाले दिनों में पश्चिमी राजस्थान की राजनीति और प्रशासनिक गलियारों में बड़ी हलचल पैदा करने वाला साबित होगा। क्या प्रशासन 16 जून से पहले जागेगा या फिर किसानों का यह आक्रोश कोई नया मोड़ लेगा, इस पर सबकी नजरें टिकी हैं।







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