सेवाड़िया मठ: अध्यात्म का अटूट केंद्र | कोटड़ा रविया में जुटेगा जनसैलाब
अध्यात्म की गंगा जहाँ अविरल बहती है, वह 'सेवाड़िया मठ' केवल एक स्थान नहीं बल्कि आस्था का वह वटवृक्ष है जिसकी शाखाओं ने अनगिनत संतों को संवारा है। इसी दिव्य मठ की परंपरा से निकले श्री 1008 महंत श्री मंडलेश्वर गणेश भारती जी के शिष्य मंगल भारती जी ने बड़गांव की वाकड़िया पहाड़ियों पर तपस्या की। सेवाड़िया मठ की महिमा अपरंपार है; यहाँ की मिट्टी में वह तप है जो पाषाण को भी पिघला दे। इसी मठ के आशीर्वाद से भीम भागल के राजजी रबारी ने 15 वर्ष की आयु में गुरु शरण ली और सवंत 1975 में 'राजभारती' बनकर संसार के दुखों को हरने का संकल्प लिया।
सेवाड़िया समरै सदा, सिद्ध भँवर सिरमोड़।
भारती कुल भूषण भयो, भक्ति तणी झकझोर।।

तपस्या का तेज और हिंसक जीवों का सख्य
महाराज श्री राजभारती जी का व्यक्तित्व ऐसा था कि उनके विशाल और चमकदार ललाट से साक्षात शिव का तेज झलकता था। वे सिद्ध पुरुष थे और उनके वचन 'हाथों-हाथ' नतीजे देते थे। भीनमाल की पहाड़ियों और मेड़कीनाथ की कंदराओं में जब वे ध्यानमग्न होते, तो प्रकृति भी नतमस्तक हो जाती। ताज्जुब की बात तो यह थी कि जिन जंगलों में आम इंसान जाने से डरता था, वहां खूंखार तेंदुए के बच्चे महाराज की गोद में खेला करते थे। ठाकुर परबत सिंह धामसीन (पूर्व प्रधान रानीवाड़ा) और नागसिंह राव रानीवाड़ा जैसे दिग्गज उनके अनन्य भक्त थे, जो महाराज के एक इशारे पर अपना सर्वस्व न्योछावर करने को तैयार रहते थे।
मेड़कीनाथ महन्त बिराजै, वनचर संग जहाँ नर गाजै।
व्याघ्र बाल कर केल कराहीं, सिद्ध पुरुष सम दूजो नाहीं।।

जल बना घी: एक अविस्मरणीय चमत्कार
महाराज की अष्टसिद्धि का सबसे बड़ा प्रमाण बड़गांव सूरजकुंड के विशाल भंडारे में देखने को मिला। जब घी कम पड़ा, तो महाराज ने शांत भाव से बावड़ी की ओर इशारा किया। उन्होंने दो डिब्बे पानी (बावड़ी का जल) कड़ाहे में डलवाया और साक्षात 'गंगा मैया' के स्मरण से वह पानी शुद्ध देसी घी में बदल गया। पूरी रात मालपुए छने और 52 मढ़ी के साधुओं ने छककर प्रसादी ली। सुबह जब दो डिब्बे घी वापस बावड़ी में डाला गया, तो वह फिर से जल बन गया। 'गुमान' करने वालों के सिर नीचें हो गए और भक्तों ने देख लिया कि जब परमात्मा साथ हो, तो प्रकृति के नियम भी बदल जाते हैं।
जल सों घी कीधौ जदी, दंग रह्यौ संसार।
राज भारती री रज़ा, परचो अपरम्पार।।
परचो अपरम्पार, बावड़ी नीर बहाया।
भोजन भयो भरपूर, देव भी दर्शन आया।।
कह 'गुमान' कविराय, वचन कदै नहिं जावै।
सिद्ध भारती नाम, जगत सब शीश नवावै।।
जनकल्याण और अनन्य भक्तों का घेरा
महाराज ने केवल भजन नहीं किया, बल्कि मानवता की सेवा को ही परम धर्म माना। गुजरात के विसनगर से लेकर धानेरा के रविया कोटडा तक उनकी कीर्ति फैली। संवत 1990 में जब उन्होंने कोटडा में तपस्या की, तो शिवनाथ सिंह सोलंकी और वाघड़ा-बोबी परिवारों के पटेलों ने अपनी पलकें बिछा दीं। उनके हाथ में सिर्फ एक कमंडल, त्रिशूल और पैरों में खड़ाऊं ही उनकी असली संपत्ति थी। वे विरक्त थे, त्यागी थे और धर्म के सच्चे रक्षक थे। उनके शिष्य धना भारती, माया भारती और ज्ञान भारती ने इस दिव्य परंपरा को जन-जन तक पहुँचाया।
रबारी कुल रो रतन, रक्षक धरम री ढाल।
सेवक सब सुख पाइया, कटिया जम रा जाल।।
68वीं पुण्यतिथि महोत्सव: कोटड़ा रविया में जुटेगा जनसैलाब
फाल्गुन शुक्ल एकादशी का वह पावन दिन, जब इस सिद्ध योगी ने अपना भौतिक शरीर त्यागकर अमरापुर की ओर प्रस्थान किया। इसी अमर विरासत को जीवंत रखते हुए, इस वर्ष 26 फरवरी को राजभारती महाराज की 68वीं पुण्यतिथि श्रद्धापूर्वक मनाई जा रही है। राजभारती महाराज समाधि धाम, कोटड़ा रविया के वर्तमान महंत 1008 श्री मदन भारती महाराज और उनके शिष्य नरेश भारती महाराज के पावन सान्निध्य में यह भव्य महोत्सव आयोजित होगा।
26 फरवरी की रात्रि को विशाल भजन संध्या होगी, जिसमें सुप्रसिद्ध कलाकार प्रवीण माली (उड़, सिरोही) अपनी सुरीली आवाज़ से भक्ति का रस घोलेंगे। साथ ही साहित्यकार मेघराज चौधरी और सहयोगी सुरेंद्र राजपूत महाराज के जीवन प्रसंगों से भक्तों को भावविभोर करेंगे। 27 फरवरी को विशाल महाप्रसादी के साथ इस महोत्सव का समापन होगा।
ग्यारस फागण री घड़ी, खुलिया स्वर्ग दुवार।
भारती राज पधारिया, अमर भयो अवतार।।
Circle News Network की ओर से महान संत राजभारती जी महाराज के चरणों में कोटि-कोटि नमन।







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