डेप्यूटेशन के ‘खेल’ से उजड रहा नौनिहालों का भविष्य; 7 दिन में मास्टर नहीं मिला तो स्कूल के गेट पर लटकेगा ताला
जालोर/रानीवाडा। सरकार चाहे ‘पढेगा इंडिया, तभी तो बढेगा इंडिया’ के कितने ही लुभावने नारे लगा ले, लेकिन धरातल पर ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा व्यवस्था किस कदर वेंटिलेटर पर है, इसकी जीता-जागती तस्वीर रानीवाडा क्षेत्र की कुंभारियो की ढाणी, रतनपुर में देखने को मिली है। यहाँ का राजकीय प्राथमिक विद्यालय शिक्षा के मंदिर से ज्यादा ‘मजाक’ बनकर रह गया है। हालात यह हैं कि पूरा विद्यालय केवल एक शिक्षक के कंधों पर चल रहा है, जिसके चलते बच्चों का भविष्य अंधकारमय होता जा रहा है। अब ग्रामीणों का सब्र जवाब दे गया है और उन्होंने प्रशासन के खिलाफ आर-पार की लडाई का बिगुल फूंक दिया है।
एक शिक्षक पर 5 कक्षाओं का ‘असंभव’ भार
ग्रामीणों ने ‘सर्कल न्यूज नेटवर्क’ को बताया कि विभाग के कागजों में तो यहाँ सब कुछ ठीक है, लेकिन हकीकत कोसों दूर है। विद्यालय में अध्यापकों के दो पद स्वीकृत हैं और कागजों में दो शिक्षक तैनात भी हैं। लेकिन यहीं से शिक्षा विभाग का असली ‘खेल’ शुरू होता है।
- डेप्यूटेशन का दीमक: विद्यालय में नियुक्त दूसरा अध्यापक अपनी ऊंची पहुंच या जुगाड के दम पर अपना डेप्यूटेशन (प्रतिनियुक्ति) किसी अन्य सुगम विद्यालय में करवाकर बैठा है।
- पढाएं या डाक बनाएं?: मौके पर मौजूद इकलौते शिक्षक पर कक्षा 1 से 5 तक के सभी बच्चों को पढाने की जिम्मेदारी है। अब सवाल यह है कि एक अकेला इंसान एक ही वक्त में पांच अलग-अलग कक्षाओं को कैसे पढा सकता है?
- मिड-डे मील का झंझट: उसी अकेले शिक्षक को बच्चों का पोषाहार (मिड-डे मील) बनवाना पडता है, विभागीय डाक तैयार करनी पडती है और प्रशासनिक कार्य भी निपटाने पडते हैं। ऐसे में ‘पढाई’ तो केवल खानापूर्ति बनकर रह गई है।
ग्रामीणों का फूटा गुस्सा: 7 दिन का अल्टीमेटम
सोमवार को स्कूल परिसर में अभिभावकों और ग्रामीणों का जमावडा लग गया। व्यवस्था से नाराज ग्रामीणों ने प्रशासन को खरी-खोटी सुनाते हुए 7 दिन का कडा अल्टीमेटम दिया है। ग्रामीणों ने एक स्वर में चेतावनी दी है कि यदि आगामी सात दिनों के भीतर विद्यालय में स्थायी अतिरिक्त अध्यापक की नियुक्ति नहीं की गई और डेप्यूटेशन का खेल खत्म नहीं हुआ, तो वे मजबूरन स्कूल के मुख्य द्वार पर तालाबंदी कर देंगे।
जिम्मेदारों की चुप्पी पर सवाल?
ग्रामीणों ने मुख्य ब्लॉक शिक्षा अधिकारी (CBEO) के नाम मांग पत्र भेजकर स्थिति स्पष्ट कर दी है। उन्होंने साफ कहा है कि तालाबंदी के बाद बच्चों की पढाई का जो भी नुकसान होगा, उसकी पाई-पाई की जिम्मेदारी शिक्षा विभाग और स्थानीय प्रशासन की होगी।
बडा सवाल यह है कि आखिर कब तक ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों के भविष्य के साथ यह खिलवाड होता रहेगा? क्या अधिकारियों को एसी कमरों से बाहर निकलकर इन स्कूलों की बदहाली दिखाई नहीं देती? या फिर डेप्यूटेशन के नाम पर यह ‘सेटिंग’ का खेल ऐसे ही चलता रहेगा?
– सवांददाता, सर्कल न्यूज नेटवर्क, रानीवाडा।



