चुनावी वादों की खुली पोल, ₹1000 में खारा पानी खरीदने को मजबूर जनता; मवेशी तोड़ रहे दम, उग्र आंदोलन की चेतावनी
खास रिपोर्ट:
राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी योजना 'जल जीवन मिशन' (जेजेएम) ग्राउंड जीरो पर किस कदर दम तोड़ रही है, इसका जीता-जागता उदाहरण सेडीया पंचायत का राजस्व गांव कबुली ढाणी है। सरकार ने 'हर घर जल' का नारा देकर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा दिए, ठेकेदारों ने पाइपलाइन बिछा दी, वाल्व कस दिए और फाइलों में टेस्टिंग भी पूरी हो गई। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि पिछले दो साल से इस पूरी लाइन में पानी की एक बूंद तक नहीं टपकी है। भीषण गर्मी के इस दौर में करीब 800 से 1000 की आबादी वाली यह बस्ती मीठे पानी की आस में पथराई आंखों से सूखी टोटियों को निहार रही है। अधिकारियों की घोर लापरवाही और ठेकेदारों की खानापूर्ति के कारण आज पूरी ढाणी बूंद-बूंद पानी के लिए मोहताज हो चुकी है।
जेब पर भारी पड़ रही 'प्यास', खारा पानी निगल रहा सेहत
कबुली ढाणी के जागरूक ग्रामीण पुखराज सियाक ने अपना दर्द बयां करते हुए बताया कि जल जीवन मिशन का काम कागजों में और धरातल पर पूरा हो चुका है, फिर भी घरों तक पानी नहीं पहुंचा। ग्रामीण इस महंगाई के दौर में ₹1000 का भुगतान कर निजी टैंकरों से खारा पानी डलवाने को मजबूर हैं। पुखराज ने सवाल उठाया कि इस कमरतोड़ महंगाई में एक आम आदमी हर हफ्ते इतना महंगा पानी कैसे खरीदेगा? पानी जीने के लिए सबसे बुनियादी जरूरत है, ऐसे में गरीब जनता जाए तो कहां जाए?
वहीं, गांव के लादूराम ने रोष जताते हुए कहा कि जब पाइपलाइन बिछ चुकी थी और टेस्टिंग की औपचारिकता भी पूरी कर ली गई, तो फिर जनता को पानी क्यों नहीं दिया जा रहा? पूरी बस्ती सिर्फ मीठे पानी के इंतजार में बैठी है, लेकिन जलदाय विभाग के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही है।
बीमार हो रहे लोग, दम तोड़ रहे मवेशी; आंदोलन की सुगबुगाहट
समस्या सिर्फ पानी की किल्लत तक सीमित नहीं है, बल्कि जो पानी मिल रहा है वह सेहत के लिए घातक साबित हो रहा है। ग्रामीण अश्विन सियाक ने बताया कि इस भीषण गर्मी के मौसम में फ्लोराइड युक्त और खारा पानी पीने के कारण गांव के लोग लगातार बीमार पड़ रहे हैं। सबसे बुरा हाल बेजुबान मवेशियों का है, जो खारे पानी और भीषण प्यास के कारण दम तोड़ रहे हैं। अश्विन ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि समय रहते प्रशासन ने सुध नहीं ली और जलापूर्ति शुरू नहीं की, तो गांव की महिलाएं, पुरुष और बुजुर्ग सड़कों पर उतरकर उग्र धरना-प्रदर्शन करने को मजबूर होंगे, जिसकी पूरी जिम्मेदारी शासन-प्रशासन की होगी।
'चुनाव में बड़े-बड़े वादे, चुनाव बाद जनता भगवान भरोसे'
नेताओं और प्रशासनिक दावों पर तीखा प्रहार करते हुए रिटायर्ड पुलिसकर्मी हरिगाराम ने कहा कि चुनाव के समय हर राजनीतिक दल और नेता बड़े-बड़े लोकलुभावने वादे करते हैं। वोट लेने के लिए मीठी-मीठी बातें की जाती हैं, लेकिन चुनाव बीतते ही जनता को उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है। पिछले दो साल से करीब हजार लोगों की यह बस्ती मीठे पानी की आस लगाए बैठी है, मगर आज तक किसी भी जनप्रतिनिधि या आला अधिकारी ने आकर इनकी सुध नहीं ली। हरिगाराम ने कड़े लहजे में पूछा कि क्या इस जनता को जीने के लिए पानी का हक नहीं है? उन्होंने सरकार से पुरजोर मांग की है कि इस गंभीर समस्या का तुरंत स्थाई समाधान कर जनता को इस नारकीय जीवन से राहत दिलाई जाए।
सर्कल न्यूज़ का सरोकार:
करोड़ों रुपए के बजट ठिकाने लगाने के बाद भी अगर जनता को ₹1000 में खारा पानी खरीदना पड़ रहा है, तो यह सीधे तौर पर प्रशासनिक तंत्र की नाकामी है। 'हर घर जल' का ढांचा खड़ा कर देना काफी नहीं है, उसमें पानी की सप्लाई सुनिश्चित करना असली जिम्मेदारी है। अब देखना यह है कि कुंभकर्णी नींद में सोया जलदाय विभाग इस खबर के बाद जागता है या कबुली ढाणी की प्यास ऐसे ही सिस्टम की भेंट चढ़ी रहती है।







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