तावीदर (रानीवाड़ा): मारवाड़ की पावन धरा भक्ति, आस्था, त्याग, शौर्य और कर्तव्यपरायणता की जीवंत मिसाल है। यहाँ के कण-कण में दिव्यता का वास है। जिस तरह राजा भागीरथ अपने अथक प्रयासों से गंगा को पृथ्वी पर लाए थे, उसी प्रकार रानीवाड़ा तहसील के तावीदर गाँव की पहाड़ी घाटी में प्रकृति ने स्वयं गंगा का एक अनुपम रूप छिपा रखा है। देवांचल की सुरम्य पहाड़ियों में स्थित गंगा दर्शन और प्रागवडलेश्वर महादेव मंदिर यहाँ के आस्थावानों के लिए किसी वरदान से कम नहीं। हज़ारों की तादाद में श्रद्धालु बरसों से इन गुप्त तीर्थों के दर्शन के लिए उमड़ते रहे हैं। तो पेश है गुमानसिंह राव की खास स्टोरी।
देवांचल की गोद में पनपता विकास और आस्था का संगम
देवांचल पर्वतमाला में बसा तावीदर गाँव, जहाँ नवीन ग्राम पंचायत बनने के बाद अब विकास की बयार भी बहने लगी है। यह आदिवासी भील बहुल पिछड़ा क्षेत्र अपनी गहरी आस्था के लिए जाना जाता है। यहाँ की पहाड़ियों में भोर होते ही गूँजने वाली प्रभातियाँ इस बात का प्रमाण हैं कि आस्था यहाँ के लोगों के रोम-रोम में बसी है।

चमत्कारिक गंगा कुंड: जहाँ श्रद्धा से मिलता है साक्षात दर्शन!
एक पहाड़ी की चोटी पर स्थित गंगा मैया का प्राचीन मंदिर बरसों पहले मात्र एक 'थान' हुआ करता था। यहाँ एक प्राकृतिक कुंड है, जिसमें गंगा के रूप में निरंतर जल का प्रवाह होता रहता है। आश्चर्यजनक बात यह है कि जून की भीषण गर्मी में, जब आस-पास की पहाड़ियाँ सूख जाती हैं, तब भी इस कुंड में जल का प्रवाह बना रहता है। स्थानीय मान्यता और श्रद्धालुओं के अनुभव बताते हैं कि गंगा के दर्शन केवल तभी होते हैं जब भक्त पूर्ण श्रद्धा और मनोयोग से आता है। यदि कोई नास्तिक या ईश्वर पर विश्वास न करने वाला यहाँ आता है, तो कुंड में गंगा का प्रवाह नहीं होता। यह अपने आप में एक अद्भुत चमत्कार है, जो भक्तों की आस्था को और दृढ़ करता है।

प्रागवडलेश्वर महादेव: जहाँ से दिखता है प्रकृति का मनमोहक नज़ारा और महाराणा प्रताप की छाप!
गंगा दर्शन के पवित्र स्थल से थोड़ी और ऊँचाई पर, दूसरी पहाड़ी चोटी पर प्रागवडलेश्वर महादेव का प्राचीन मंदिर विद्यमान है। यह चोटी इतनी ऊँची है कि यहाँ से पूरे क्षेत्र का विहंगम और नयनाभिराम दृश्य मंत्रमुग्ध कर देता है। पहाड़ों पर छाई हरियाली ऐसी प्रतीत होती है, मानो प्रकृति ने हरे रंग की चादर ओढ़ ली हो।
एक प्रचलित किंवदंती के अनुसार, इन पहाड़ों में मेवाड़ के वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप का भी विचरण हुआ था। श्री सुंधामाता और सौमरी माता के दर्शन के बाद महाराणा प्रताप ने कुछ दिनों तक यहीं विश्राम किया था। आज भी इन पहाड़ियों पर घोड़ों को बाँधने के लिए बनाए गए 'पायगा' (अस्तबल) के अवशेष दिखाई देते हैं, जो इस क्षेत्र के गौरवशाली इतिहास की गवाही देते हैं।

बरसों पहले अमरसिंह झाला आजोदर की ओर से पीतल का विशाल घंटा गंगा मैया के मंदिर पर चढाया गया था। उस वक्त हमारा भी मंछाराम परिहार के साथ दर्शन करने जाना हुआ था।
लोकगीतों में गूँजती है इस तीर्थ की महिमा!
इस पवित्र तीर्थ को लेकर मारवाड़ में कई लोकप्रिय भजन प्रचलित हैं, जिनमें से एक है: "प्रागवड रे पोनडे क्यू समोणों सांवला।" लोक कलाकारों ने स्थानीय स्तर पर इस क्षेत्र की महिमा का बखूबी बखान किया है, जिससे इसकी ख्याति दूर-दूर तक फैली है। यह क्षेत्र देवल परिहार गौत्र के राजपूतों का संरक्षित क्षेत्र रहा है। कलापुरा से करडा तक फैले 52 गाँवों की जागीर का यह हिस्सा कभी अत्यंत समृद्ध और धन-धान्य से परिपूर्ण था।
श्रावण में होगा भव्य मेला, महाप्रसादी का भी आयोजन!
इस वर्ष श्रावण की अगली पूर्णिमा को प्रागवडलेश्वर महादेव और गंगा मैया के मंदिर में एक भव्य मेले का आयोजन किया जाएगा। इसमें हज़ारों की संख्या में आस्थावान लोग भाग लेकर दर्शन का लाभ उठाएँगे। गंगा मैया के मंदिर तक अब ट्रैक्टर से पहुँचा जा सकता है, जिसके बाद प्रागवडलेश्वर मंदिर तक का रास्ता पैदल तय करना होता है।
आप सभी को सूचित किया जाता है कि 4 अगस्त को तावीदर ग्रामीणों की ओर से महाप्रसादी का भी भव्य आयोजन किया गया है। तो फिर देर किस बात की? एक बार इन पवित्र स्थलों के दर्शन के लिए अवश्य पधारें! कहते हैं, यहाँ दर्शन के बाद पाप-पुण्य का हिसाब भी हो जाता है और मन को परम शांति की अनुभूति होती है। यह सिर्फ एक तीर्थ नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि का एक अनुभव है!







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