2+2 बसों में सहयोगी सहित आजीवन निःशुल्क यात्रा सुविधा देने की उठी मांग, शिक्षक दिवस पर घोषणा की आस
सर्कल न्यूज नेटवर्क जालोर, 2 सितम्बर। राजस्थान की माटी में गुरु को सदैव सर्वोच्च स्थान मिला है, लेकिन जीवन भर समाज को ज्ञान की रोशनी देने वाले राज्य पुरस्कृत वरिष्ठ शिक्षक आज उम्र के अंतिम पड़ाव में उपेक्षा और असहजता झेलने को मजबूर हैं। जालोर जिला ओलम्पिक एसोसिएशन के महासचिव लाल सिंह सांखला ने मुख्यमंत्री को पत्र भेजकर मांग की है कि 70 से 80 वर्ष की आयु पार कर चुके इन वयोवृद्ध शिक्षकों को रोडवेज की आरामद2+2 बसों में एक सहयोगी (अटेंडेंट) सहित निःशुल्क यात्रा की पात्रता दी जाए।

वर्तमान में राज्य सरकार द्वारा प्रदत्त पास की सुविधा केवल 2+3 l (ऑर्डिनरी) श्रेणी की बसों तक ही सीमित है, जिससे गिरते स्वास्थ्य और शारीरिक असमर्थता के चलते बुजुर्ग शिक्षकों के लिए सफर करना बेहद कष्टप्रद साबित हो रहा है। एसोसिएशन ने 5 सितम्बर शिक्षक दिवस पर इस संबंध में ऐतिहासिक निर्णय की अपेक्षा जताई है।

बुजुर्ग शिक्षकों की व्यथा और बस श्रेणियों का गणित
बस श्रेणियों की परिभाषा (2+3 बनाम 2+2) रोडवेज बेड़े में सीटों की बनावट यात्रा की सुगमता तय करती है:
- 2+3 साधारण बस (Ordinary Bus): इसमें गलियारे (Aisle) के एक तरफ 2 और दूसरी तरफ 3 सीटें होती हैं। सीट की चौड़ाई कम और लेगरूम बेहद संकरा होता है। भीड़ अधिक होने और झटकों के कारण 70-80 वर्ष के बुजुर्गों के लिए इसमें बैठना कष्टकारी होता है।
- 2+2 आरामदायक बस (Express/Deluxe/AC): इसमें गलियारे के दोनों ओर 2-2 चौड़ी सीटें होती हैं। बेहतर स्पेस, पुश-बैक सुविधा और झटकों से राहत के कारण यह वरिष्ठ नागरिकों व अस्वस्थ यात्रियों के लिए अनुकूल मानी जाती है।
वित्तीय भार नगण्य, सम्मान होगा अद्वितीय सांखला ने स्पष्ट किया कि प्रदेश में राज्य स्तर पर पुरस्कृत होकर वयोवृद्ध अवस्था (70-80 वर्ष) में पहुंचे शिक्षकों की कुल संख्या सीमित है।
- सीमित संख्या: प्रतिवर्ष चुनिंदा शिक्षकों को ही यह राज्य स्तरीय सम्मान मिलता है, जिनमें से वर्तमान में वयोवृद्ध पेंशनर्स की तादाद प्रदेशभर में बेहद कम है।
- शून्य वित्तीय प्रभाव: सीमित संख्या के चलते यदि इन्हें 2+2 श्रेणी और एक अटेंडेंट की पात्रता दी जाती है, तो राज्य के राजकोष पर वित्तीय भार नगण्य पड़ेगा।
- अटेंडेंट की अनिवार्यता: अत्यधिक वृद्धावस्था, चलने-फिरने में असमर्थता व गंभीर बीमारियों के कारण इन गुरुजनों के साथ एक सहायक का होना अनिवार्य बन चुका है।









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