रानीवाड़ा में हर्षोल्लास के साथ मनाई गई संत रविदास जयंती, भाजपा कार्यालय में उमड़ा कार्यकर्ताओं का हुजूम
रानीवाड़ा। भारतीय जनता पार्टी विधानसभा रानीवाड़ा द्वारा स्थानीय भाजपा कार्यालय में महान संत शिरोमणि रविदास की जयंती श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ मनाई गई। कार्यक्रम में पूर्व विधायक एवं पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष नारायणसिंह देवल ने शिरकत कर संत के चित्र पर दीप प्रज्वलन और पुष्पांजलि अर्पित की।
इस अवसर पर कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए पूर्व विधायक नारायणसिंह देवल ने कहा कि संत रविदास बचपन से ही गहरे आध्यात्मिक और धार्मिक स्वभाव के थे। उन्होंने समाज में व्याप्त कुरीतियों को दूर कर 'सामाजिक समरसता' का जो मंत्र दिया, वह आज भी प्रासंगिक है। देवल ने आह्वान किया कि हमें उनके बताए मार्ग पर चलकर समाज में एकता और भाईचारे को मजबूत करना चाहिए।
इनकी रही गरिमामयी उपस्थिति
कार्यक्रम का आयोजन जिला संयोजक रमेश मेघवाल धनपुरा, विधानसभा संयोजक दिनेश कुमार गर्ग, बाबूलाल मेघवाल और पूर्व जिला महामंत्री प्रकाश मेघवाल के सान्निध्य में हुआ। इस दौरान नरेश जोशी, भाजपा मंडल उपाध्यक्ष जीवाराम मेघवाल, पूर्व मंडल अध्यक्ष रिडमलसिंह डाभी, वीर बहादुरसिंह देवड़ा, लक्ष्मण मेघवाल, योगेश परमार और जबराराम भील सहित बड़ी संख्या में कार्यकर्ता उपस्थित रहे। साथ ही, सिंगावास में भी बाबूलाल मेघवाल की उपस्थिति में जयंती कार्यक्रम धूमधाम से संपन्न हुआ।
विशेष: कौन थे संत शिरोमणि रविदास?
संत रविदास (जिन्हें 'रैदास' के नाम से भी जाना जाता है) 15वीं-16वीं शताब्दी के दौरान भक्ति आंदोलन के एक महान संत, कवि और समाज सुधारक थे। उनकी शिक्षाएं और जीवन आज भी करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।
- जन्म और काल: उनका जन्म वाराणसी (काशी) के सीर गोवर्धनपुर गांव में हुआ था। उन्हें कबीर दास के समकालीन और मीराबाई का आध्यात्मिक गुरु माना जाता है।
- सामाजिक समरसता के अग्रदूत: रविदास जी ने ऊंच-नीच, जात-पात और छुआछूत जैसी कुरीतियों का कड़ा विरोध किया। उन्होंने संदेश दिया कि "मन चंगा तो कठौती में गंगा", अर्थात यदि आपका मन शुद्ध है, तो ईश्वर आपके हृदय में ही निवास करते हैं।
- बेगमपुरा की संकल्पना: उन्होंने 'बेगमपुरा' (एक ऐसा शहर जहाँ कोई दुख न हो) की परिक्रमा की थी, जो एक ऐसे समाज का प्रतीक है जहाँ जाति या धर्म के आधार पर कोई भेदभाव न हो और सभी को समान अधिकार मिलें।
- साहित्यिक योगदान: उनके पद और भजन इतने प्रभावशाली थे कि उनके 40 पदों को सिखों के पवित्र धर्मग्रंथ 'गुरु ग्रंथ साहिब' में भी शामिल किया गया है।
- प्रमुख संदेश: उनका पूरा जीवन "मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है" के सिद्धांत पर आधारित था। उन्होंने श्रम (काम) को पूजा माना और जूते बनाने के अपने पुश्तैनी काम को पूरी ईमानदारी और भक्ति के साथ किया।







पाठक टिप्पणियां (Comments)
0 टिप्पणियां