• जुंजाणी शिविर में समाजसेवी रेवाराम सेन ने सीएम के नाम तहसीलदार को सौंपा ज्ञापन • तर्क- जब सांसद-विधायक पर रोक नहीं, तो पंच-सरपंच पर पाबंदी क्यों?
सर्कल न्यूज नेटवर्क भीनमाल। पंचायती राज चुनावों में तीन संतान की बाध्यता को लेकर अब विरोध के स्वर मुखर होने लगे हैं। इस नियम को भेदभावपूर्ण और अलोकतांत्रिक बताते हुए इसे तत्काल हटाने की मांग की गई है। बुधवार को जुंजाणी में आयोजित 'ग्रामीण समस्या समाधान शिविर' के दौरान समाजसेवी रेवाराम सेन ने इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया और मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के नाम तहसीलदार भीखादान चारण को ज्ञापन सौंपा।
लोकतंत्र में दोहरे मापदंड पर सवाल समाजसेवी रेवाराम सेन के नेतृत्व में सौंपे गए ज्ञापन में सरकार की नीति पर तीखे सवाल खडे (ड) किए गए हैं। ज्ञापन में बताया गया कि देश में लोकसभा और विधानसभा चुनावों के लिए प्रत्याशियों पर तीन संतान को लेकर कोई पाबंदी नहीं है। सांसद और विधायक बिना किसी संतान बाध्यता के चुनाव लड (ड) सकते हैं, लेकिन पंचायती राज चुनावों में यह नियम थोपना अनुचित है।

योग्य उम्मीदवार हो रहे वंचित ज्ञापन में तर्क दिया गया कि इस नियम के कारण गांव के कई योग्य, अनुभवी और समाजसेवा का जज्बा रखने वाले व्यक्ति चुनावी प्रक्रिया से बाहर हो जाते हैं। तीन संतान की बाध्यता हटने से अधिकाधिक लोग लोकतंत्र के इस उत्सव में भाग ले सकेंगे, जिससे पंचायती राज व्यवस्था और मजबूत होगी।
ये रहे मौजूद शिविर के दौरान तहसीलदार भीखादान चारण ने ज्ञापन स्वीकार कर उचित माध्यम से सीएम तक पहुंचाने की बात कही। इस मौके पर पूर्व वार्ड पंच हरचंदराम सोनी सहित बडी (ड) संख्या में ग्रामीण और गणमान्य नागरिक मौजूद थे।
इनसाइड स्टोरी: नियम बना रोड़ा पंचायती राज अधिनियम के तहत 1995 के बाद तीसरी संतान होने पर व्यक्ति पंचायती राज का चुनाव नहीं लड सकता। इसी नियम के चलते कई बार निर्विरोध निर्वाचन की स्थिति बनती है या फिर कम योग्य व्यक्ति को मौका मिल जाता है। ग्रामीणों का तर्क है कि नियम ऊपर से नीचे तक एक समान होना चाहिए।







पाठक टिप्पणियां (Comments)
0 टिप्पणियां