दौलतपुरा और आखराड़ गांवों में कृषि विज्ञान केंद्र बामनवाड़ा व विभागों का संयुक्त आयोजन, किसानों को मिली तकनीकी जानकारी और सरकारी योजनाओं की सौगात
रानीवाड़ा (जालोर)। खेती अब सिर्फ हल चलाने का नाम नहीं, बल्कि ज्ञान, नवाचार और तकनीक का संगम बन चुकी है। इसी सोच को धरातल पर उतारने के लिए रानीवाड़ा ब्लॉक के दौलतपुरा एवं आखराड़ गांवों में विकसित कृषि संकल्प अभियान का भव्य आयोजन किया गया। कार्यक्रम का आयोजन कृषि विज्ञान केंद्र बामनवाड़ा एवं कृषि व उद्यानिकी विभाग के संयुक्त प्रयास से किया गया, जिसमें किसानों को खेती से जुड़े वैज्ञानिक दृष्टिकोण, रोग नियंत्रण, जल प्रबंधन और सरकारी योजनाओं की जानकारी दी गई।
वैज्ञानिकों ने खोले खेती के नए दरवाजे
कार्यक्रम में कृषि विज्ञान केंद्र बामनवाड़ा के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. प्रकाश यादव ने अभियान की अवधारणा से लेकर खेतों में सीधे लागू होने वाले अनुसंधान और तकनीकों की जानकारी साझा की। खरीफ और रबी फसलों में लगने वाले प्रमुख कीट और रोगों की पहचान तथा उनके प्राकृतिक और रासायनिक नियंत्रण उपायों पर विस्तार से चर्चा हुई। उन्होंने किसानों को मृदा और जल परीक्षण की अहमियत भी बताई।
कृषि अनुसंधान केंद्र सुमेरपुर के वैज्ञानिक डॉ. हर्षवर्धन सिंह ने ‘दुगुनी आमदनी का फार्मूला’ विषय पर बात करते हुए उन्नत बीजों, फसल विविधिकरण और वैज्ञानिक पद्धतियों से खेती करने पर बल दिया। उन्होंने कहा, “खेती सिर्फ परंपरा नहीं, अब व्यवसाय है, और इसमें वैज्ञानिक सोच जरूरी है।”
विभागों ने दी योजनाओं की जानकारी
उद्यान विभाग के कृषि अधिकारी छोटूराम हकला ने प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, पीएम-कुसुम सोलर पंप, ग्रीन हाउस और अन्य उद्यानिकी योजनाओं के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि "खेती में बागवानी जोड़ने से आमदनी का नया रास्ता खुलता है।"
कृषि विभाग के सहायक कृषि अधिकारी वागाराम पुरोहित ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, तारबंदी, फार्म पॉन्ड, कृषि यंत्र अनुदान, और गोवर्धन जैविक उर्वरक योजना की जानकारी दी, जिससे किसान कम लागत में ज्यादा उत्पादन ले सकते हैं।
कृषि पर्यवेक्षक लेखराज मीणा ने लघु सीमांत किसानों को ₹30,000 की बैल आधारित खेती प्रोत्साहन राशि एवं वर्मी कम्पोस्ट इकाई स्थापना की जानकारी दी। उन्होंने किसानों से आह्वान किया कि वे जैविक खेती को अपनाएं, ताकि भूमि की उपजाऊ शक्ति और पर्यावरण दोनों को संजोया जा सके।
खबर की खास बात:
इस अभियान से जुड़कर स्थानीय किसान सिर्फ श्रोता नहीं रहे, बल्कि संवादकर्ता भी बने। कार्यक्रम के दौरान किसानों ने सवाल पूछे और वैज्ञानिकों से खेत में सीधे अपनाई जा सकने वाली व्यावहारिक तकनीकें सीखी। इससे साफ है कि यदि विज्ञान खेतों तक पहुंचे, तो गांवों में समृद्धि दूर नहीं।
कुल मिलाकर, विकसित कृषि संकल्प अभियान ने किसानों को नई राह दिखाई, जहां परंपरा और तकनीक का मेल खेती को व्यवसाय, और किसान को उद्यमी बना सकता है। यह आयोजन न केवल जानकारी का मंच बना, बल्कि उम्मीदों का बीजारोपण भी किया – एक ऐसी खेती के लिए जो स्वावलंबी, वैज्ञानिक और सतत हो।







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