— तीन बार सूची में नाम आने के बाद भी अचानक विलोपित हुई बिलड़ पंचायत; ग्रामीणों ने जातिवाद और राजनीतिक दबाव का लगाया आरोप, चुनावों में भाजपा को भारी नुकसान की चेतावनी।
रानीवाड़ा (जालौर)। आगामी पंचायती राज चुनावों से ठीक पहले रानीवाड़ा पंचायत समिति के राजनीतिक गलियारों में उस समय हड़कंप मच गया, जब 28 दिसंबर को जारी नए सरकारी आदेशों में नवगठित बिलड़ ग्राम पंचायत को अचानक ‘विलोपित’ (निरस्त) कर दिया गया। इस फैसले ने न केवल ग्रामीणों की खुशियों पर पानी फेर दिया है, बल्कि भजनलाल सरकार के खिलाफ आक्रोश की एक नई चिंगारी सुलगा दी है।
खुशियां हुईं काफूर: तीन बार हुआ गठन, अंतिम समय में हुआ ‘गेम’
ग्रामीणों और स्थानीय भाजपा नेताओं का कहना है कि पंचायत पुनर्गठन और पुनर्सीमांकन की पूरी प्रक्रिया के दौरान तीन अलग-अलग सरकारी सूचियों में ‘बिलड़’ का नाम शामिल था। राज्यपाल महोदय की अनुमति और जिला कलेक्टर व उपखंड अधिकारी (SDM) की देखरेख में बिलड़ और चरपटिया गांवों को मिलाकर एक सशक्त पंचायत की नींव रखी गई थी。 नक्शा जारी हो चुका था और चुनावी तैयारियां जोर-शोर से चल रही थीं, लेकिन ऐन वक्त पर आए निरस्तीकरण के आदेश ने संवैधानिक अधिकारों पर कुठाराघात किया है。

जातिवाद और राजनीतिक षड्यंत्र की आ रही बू
वीडियो संदेश के माध्यम से भाजपा नेता जेठाराम उर्फ जेके पुरोहित ने सीधे तौर पर जनप्रतिनिधियों और प्रशासन को आड़े हाथों लिया है。 उन्होंने बताया कि:
- भाजपा का गढ़: बिलड़ और चरपटिया क्षेत्र भाजपा के मजबूत वोट बैंक माने जाते हैं, फिर भी अपनी ही सरकार में इस पंचायत को खारिज करना समझ से परे है。
- जातीय समीकरण: यह क्षेत्र कलबी चौधरी बहुल है। ग्रामीणों का आरोप है कि कुछ लोग नहीं चाहते कि बिलड़ का अपना सरपंच या उपसरपंच बने, जिससे विकास की राह खुल सके。
- 75 साल का इंतजार: ग्रामीणों के अनुसार, आजादी के इतने दशकों बाद भी बिलड़ गांव को अपना स्वतंत्र प्रतिनिधित्व नहीं मिला है。

सख्त चेतावनी: ‘नुकसान झेलने को तैयार रहे सत्ता पक्ष’
भाजपा नेता जेके पुरोहित ने प्रशासन और पूर्व एमएलए सहित उच्च अधिकारियों से गुहार लगाई है कि बिलड़ और चरपटिया की भावनाओं के साथ खिलवाड़ न किया जाए。 उन्होंने स्पष्ट कहा कि यदि यह आदेश वापस नहीं लिया गया, तो आगामी पंचायती राज चुनावों में भाजपा को इसका भारी खामियाजा भुगतना पड़ेगा。 चरपटिया के करीब 180 ग्रामीणों ने अंगूठा लगाकर अपनी सहमति और साक्ष्य दिए थे, जो अब ठंडे बस्ते में जाते दिख रहे हैं。
“हमने राज्यपाल, कलेक्टर और एसडीएम साहब से विनती की थी। हमारी पंचायत तीन बार स्वीकृत हुई, नक्शा जारी हुआ। अब किसी दबाव में आकर इसे खारिज करना सरासर अन्याय है। हम कागमाला में शामिल नहीं रहना चाहते, हमें विकास के लिए अलग पंचायत चाहिए।” — जेके पुरोहित, भाजपा नेता
प्रशासनिक पेंच या राजनीतिक खेल?
पुनर्गठन की प्रक्रिया में अंतिम दौर में ‘विलोपन’ की यह घटना केवल प्रशासनिक त्रुटि नहीं मानी जा रही है। ग्रामीणों का मानना है कि यह राजनीतिक रसूख और दबाव का नतीजा है। अब देखना यह है कि क्या जन आक्रोश को देखते हुए सरकार अपने फैसले पर पुनर्विचार करती है या रानीवाड़ा में भाजपा को अपनों की ही नाराजगी का सामना करना पड़ेगा।



