भारत की सांस्कृतिक और कृषक परंपराओं में गौ माता का हमेशा से ही विशेष स्थान रहा है। इसी परंपरा को ध्यान में रखते हुए, ग्राम धानोल में 14 मार्च को, होली के पावन पर्व पर लाइव टेलीकास्ट के माध्यम से गौ आधारित प्राकृतिक खेती का विशेष प्रशिक्षण आयोजित किया गया। यह आयोजन पदमाराम आंजणा (प्रांत गौ ऊर्जा आयाम प्रमुख एवं बालोतरा जिला गौ सेवा संयोजक) के नेतृत्व में हुआ, जिसमें ग्राम के किसानों ने बड़ी संख्या में भाग लिया और इसे एक प्रेरक कदम के रूप में देखा गया।

प्रशिक्षण का उद्देश्य और विषय
इस ऑनलाइन प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य किसानों को रासायनिक मुक्त खेती की दिशा में प्रेरित करना था। इसमें घनजीवामृत, बीजामृत, जीवामृत, संजीवक, अग्निस्त्र, ब्रह्मास्त्र, निमास्त्र और दसपर्णी अर्क जैसे गौ आधारित उत्पादों के उपयोग की विस्तृत जानकारी प्रदान की गई। इन विधियों के माध्यम से खेती न केवल पर्यावरण के लिए अनुकूल होगी बल्कि इससे मिट्टी की उर्वरता भी प्राकृतिक रूप से बनी रहेगी।
गौ माता का महत्व और जैविक खेती
आंजणा ने इस अवसर पर गौ माता के महत्व पर जोर दिया और बताया कि गौ आधारित खेती कैसे किसानों के लिए एक लाभकारी और टिकाऊ विकल्प है। उन्होंने किसानों को यह भी सिखाया कि किस प्रकार कम लागत पर बायोगैस संयंत्र स्थापित किए जा सकते हैं और अपने घर के बीजों को बीजामृत से उपचारित कर जैविक खेती की शुरुआत की जा सकती है।
प्रतिभागियों की सहभागिता और संकल्प
इस कार्यक्रम में किसानों और मातृशक्ति ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। सभी ने सामूहिक रूप से यह संकल्प लिया कि वे अब प्रत्येक खेत में गौ आधारित जैविक खेती की दिशा में काम करेंगे। इस दौरान कई प्रमुख व्यक्तित्व, जैसे मूलाराम चौधरी (जिला सह प्रशिक्षण प्रमुख), कालू सिंह (जिला गौ सेवा संयोजक) और शैतान सिंह (जिला प्रशिक्षण प्रमुख) ने उपस्थित किसानों का मार्गदर्शन किया।

एक नई दिशा में कदम
यह आयोजन न केवल किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण सीख थी, बल्कि यह भी दिखाता है कि परंपरागत पद्धतियों को अपनाकर कैसे भविष्य की समस्याओं का समाधान खोजा जा सकता है। किसानों ने सामूहिक रूप से गौ आधारित खेती को अपनाने का संकल्प लेकर अपने खेतों और पर्यावरण को सुरक्षित रखने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है।
आभार और भविष्य की संभावनाएँ
कार्यक्रम के अंत में, मूलाराम चौधरी ने सभी किसानों और मातृशक्ति का आभार प्रकट किया और इस प्रकार के आयोजनों की निरंतरता की इच्छा व्यक्त की। यह आयोजन न केवल एक प्रेरक पहल थी, बल्कि यह आने वाले समय में जैविक और प्राकृतिक खेती की ओर एक बड़े आंदोलन का सूत्रपात भी हो सकता है।



