भामाशाहों का जज्बा और ग्रामीणों का समर्पण: शैक्षणिक उत्कृष्टता के बाद अब भौतिक विकास में भी कोटड़ा विद्यालय ने गाड़े सफलता के झंडे
कोटड़ा (रानीवाड़ा)। कहते हैं यदि मन में दृढ़ इच्छाशक्ति हो और समुदाय का साथ मिले, तो सरकारी स्कूलों की तस्वीर भी कॉन्वेंट स्कूलों से बेहतर हो सकती है। उपखंड के राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय कोटड़ा ने कुछ ऐसा ही कर दिखाया है। पिछले सत्र में बेहतरीन बोर्ड परीक्षा परिणाम देने के बाद, अब विद्यालय ने भौतिक संसाधनों के मामले में ₹51 लाख की लागत से विकास के नए आयाम स्थापित किए हैं।

साजन जी गोदारा परिवार ने पेश की उदारता की मिसाल
विद्यालय के इस आधुनिक स्वरूप में भामाशाहों का योगदान सबसे महत्वपूर्ण रहा है। भामाशाह साजन जी गोदारा एवं उनके परिवार ने ₹12 लाख की लागत से 30×30 के भव्य नवीन कक्षा-कक्ष (हॉल) का निर्माण करवाकर शिक्षा के प्रति अपनी अटूट आस्था प्रकट की है। हालांकि रूम का प्लास्टर कार्य अभी शेष है, लेकिन इस बड़े हॉल के बनने से विद्यार्थियों के बैठने की समस्या का स्थाई समाधान हो गया है।
जनसहयोग से चमका ‘सौर ऊर्जा’ का उजाला
विद्यालय को बिजली के मामले में आत्मनिर्भर बनाने के लिए ग्रामीणों और भामाशाहों ने मिलकर ₹10 लाख का जनसहयोग जुटाया, जिससे 12.5 किलोवाट का सोलर प्लांट स्थापित किया गया है। इसके साथ ही एक छोटा कमरा और लेट-बाथ की सुविधा भी तैयार की गई है।

विकास के पहिए: पंचायत और विभाग का भी मिला साथ
विद्यालय के सर्वांगीण विकास में ग्राम पंचायत और सरकार का भी सराहनीय योगदान रहा:
- ग्राम पंचायत: ₹10 लाख की लागत से बड़ा गोलाकार टिन शेड निर्मित।
- शिक्षा विभाग: ₹10 लाख से सभी कमरों में कोटा स्टोन फर्श का कार्य।
- जल जीवन मिशन: ₹6 लाख की लागत से टांका निर्माण और जल संरक्षण प्रणाली।
- अन्य सहयोग: ₹3 लाख की अतिरिक्त सामग्री जनसहयोग से प्राप्त हुई।
प्रधानाचार्य का विजन: “सबका साथ, विद्यालय का विकास”
विद्यालय के प्रधानाचार्य गिरधारी लाल ने हर्ष व्यक्त करते हुए बताया कि विद्यालय अब शैक्षणिक और भौतिक दोनों क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा है। उन्होंने कहा, “यदि इसी तरह दानदाता और ग्रामीण विद्यालय से जुड़े रहे, तो सरकारी स्कूल निजी स्कूलों को पीछे छोड़ देंगे। हमारा लक्ष्य विद्यार्थियों को श्रेष्ठतम माहौल देना है।”
प्रेरणा संदेश: कोटड़ा स्कूल की यह तस्वीर जिले के अन्य गांवों के लिए एक संदेश है कि यदि ग्रामीण और भामाशाह एकजुट हो जाएं, तो संसाधनों की कमी कभी शिक्षा के आड़े नहीं आएगी।



