30 अक्टूबर से शुरू होगा हाजी कादर शाह बाबा का सालाना उर्स, लखनऊ के मशहूर कव्वाल बिखेरेंगे कलाम
रानीवाड़ा (सर्कल न्यूज़ नेटवर्क)।
रानीवाड़ा खुर्द के निकट स्थित हजरत हाजी कादर शाह बाबा की साईंजी की बेरी दरगाह पर होने वाला 48वां सालाना उर्स कौमी एकता और आपसी भाईचारे की मिसाल पेश करने को तैयार है। इस पाक मौके का आगाज़ (शुरुआत) 29 अक्टूबर को दरगाह के बुलंद दरवाजे पर परचम खुशाई (झंडे की रस्म) के साथ होगी, जिसके बाद 30 अक्टूबर को मुख्य तक़रीबात (कार्यक्रम) आयोजित किए जाएंगे।

इतिहास और अकीदत का मरकज़:
साईंजी की बेरी दरगाह क्षेत्र की उन चंद इबादतगाहों (पूजा स्थलों) में से एक है, जहां हिंदू-मुस्लिम दोनों अकीदतमंदों (श्रद्धालुओं) का अटूट विश्वास है। यहां के इतिहास के पन्ने बताते हैं कि यह मुक़ाम (स्थान) वर्षों से सांप्रदायिक सौहार्द का मरकज़ (केंद्र) रहा है। हाजी कादर शाह बाबा की दरगाह पर हाजिरी देने के लिए सिर्फ जालोर और सिरोही ही नहीं, बल्कि गुजरात और महाराष्ट्र से भी जायरीन (तीर्थयात्री) अपनी मुरादें (इच्छाएं) लेकर आते रहे हैं। इस दरगाह की रिवायत (परंपरा) है कि हर उर्स पर दोनों समुदायों के लोग एक साथ बाबा की मज़ार पर अकीदत के फूल (श्रद्धांजलि) पेश करते हैं।
तैयारियां जोरों पर, 48वां उर्स भव्य:
हाजी कादर शाह बाबा के दो दिवसीय सालाना उर्स का आयोजन गद्दीनशीन पीर सैय्यद मोहम्मद अली साहब और सैय्यद हसन अली साहब डीसा वालों की सरपरस्ती (संरक्षण) में मनाया जाएगा। दरगाह कमेटी के अध्यक्ष मिस्त्री आबाद खान ने बताया कि उर्स इंतजामिया कमेटी की ओर से पुख्ता इंतज़ामात (ठोस व्यवस्थाएं) किए जा रहे हैं।
दरगाह खादिम सद्दीकबख्श ने जानकारी दी कि 29 अक्टूबर की सुबह 11 बजे झंडे की रस्म के साथ उर्स का आगाज़ होगा, जिसके बाद जायरीनों का हुजूम उमड़ेगा।
कव्वाली का शमा (समां):
उर्स के मुख्य दिन 30 अक्टूबर को संदल-गुलाबपेशी की रस्म (रीति) अदा की जाएगी। इसी रात 10 बजे से इल्मी और रुहानी महफ़िल सजेगी। हिंदुस्तान के मशहूर कव्वाल कमर अहमद वारसी (लखनऊ) अपनी बेहतरीन कलाम (भक्ति गीत/कविताएं) पेश करेंगे, जो रात भर अकीदतमंदों को झूमने पर मजबूर कर देंगे।
इंतज़ामात माकूल:
उर्स को लेकर दरगाह परिसर को रंग-रोगन और आकर्षक रोशनी से आरास्ता (सजाया) किया जा रहा है। बाहर से आने वाले जायरीनों के लिए खाने, पानी, साफ-सफाई और ठहरने की दरगाह पर सारी माकूल व्यवस्थाऐं (उचित व्यवस्थाएं) की जा रही हैं, ताकि किसी भी जायरीन को कोई तकलीफ (परेशानी) न हो। यह उर्स एक बार फिर भाईचारे की अज़ीम (महान) परंपरा को फ़रोग़ (बढ़ावा) देगा।



