खेती-बाड़ी से उजड़ते भीनमाल के ग्रामीण अंचल में अब पानी को लेकर आर-पार की लड़ाई का बिगुल बज चुका है। शुक्रवार को भीनमाल उपखंड कार्यालय के बाहर उमड़ी हजारों किसानों की भीड़ और हवा में गूंजते नारे महज़ एक विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि पिछले दो दशकों से उपेक्षा का दंश झेल रहे 120 गांवों की चीख थे। बांडी नदी बचाओ संघर्ष समिति के नेतृत्व में आए किसानों ने साफ कर दिया है कि अगर सरकार ने उनकी प्यास नहीं बुझाई, तो 29 जुलाई से पूरा क्षेत्र उग्र आंदोलन की आग में धधक उठेगा।
विरासत से विवाद तक: बांडी नदी और सिणधरा बांध की पूरी कहानी
1. बांडी नदी: जो कभी लाइफलाइन थी, अब रेगिस्तान बन रही जालौर और भीनमाल क्षेत्र की बांडी नदी कभी इस इलाके का मुख्य जलस्रोत हुआ करती थी। इसके प्राकृतिक बहाव से आस-पास के कुएं और भूजल स्तर हमेशा रिचार्ज रहते थे। लेकिन, पिछले बीस वर्षों में स्थिति बद से बदतर हो गई है। नदी सूखी पड़ी है, जिसके कारण डाउन स्ट्रीम (बहाव क्षेत्र के निचले हिस्से) में आने वाले लगभग 120 गांवों का वाटर लेवल 500 फीट से गिरकर सीधे 1200 फीट तक पाताल में पहुंच चुका है। पानी के इस संकट ने क्षेत्र की कृषि व्यवस्था को तबाह कर दिया है, पशु प्यासे मर रहे हैं और रोजगार न मिलने के कारण हजारों युवाओं को मजबूरी में पलायन करना पड़ रहा है।
2. सिणधरा बांध: 37 करोड़ का वो प्रोजेक्ट, जिसने पानी रोकने का काम तो किया, देने का नहीं वर्ष 2006 में तत्कालीन सरकार ने करीब 37 करोड़ रुपये की भारी-भरकम लागत से सिणधरा बांध का निर्माण करवाया था। मकसद था पानी का संचय करना। लेकिन पिछले 20 सालों में यह बांध कई बार पूरा भरने के बावजूद भीनमाल के लिए अभिशाप साबित हुआ। इस बांध के पानी का न तो कभी सिंचाई में इस्तेमाल हो पाया और न ही पीने के पानी की सप्लाय में। उलटा इस 45 फीट ऊंचे बांध ने बांडी नदी के प्राकृतिक प्रवाह को पूरी तरह ब्लॉक कर दिया, जिससे नदी के निचले इलाकों में सूखा फैल गया।
3. पड़ोस में नर्मदा का दलदल, भीनमाल में बूंद-बूंद की तड़प किसानों का सबसे बड़ा दर्द यह है कि उनके ठीक पास स्थित सांचौर क्षेत्र में नर्मदा नहर के पानी की इतनी अधिकता है कि वहां कई जगह जलभराव और दलदल की स्थिति बन चुकी है। वहीं, गुजरात सरकार नर्मदा के पानी से अपने तालाबों और जलस्रोतों को रिचार्ज कर रही है। भीनमाल के किसानों का कहना है कि जब सांचौर में पानी फालतू बह रहा है, तो भरूड़ी गांव के पास पहले से बिछी नर्मदा पाइपलाइन के जरिए बरसात के चार महीनों में बिना फिल्टर किया हुआ नर्मदा का पानी बांडी नदी में क्यों नहीं डाला जा सकता? इससे सरकार पर बिना किसी अतिरिक्त खर्च के 120 गांवों का भूजल स्तर वापस सुधर सकता है।
किसानों की पांच सूत्री मांगें: जिन पर टिका है भीनमाल का भविष्य
संघर्ष समिति के प्रमुख सेवादार श्रवण सिंह राठौड़ के नेतृत्व में किसानों ने उपखंड अधिकारी (एसडीएम) को सौंपे ज्ञापन में पांच प्रमुख मांगें बिंदुवार रखी हैं:
- नर्मदा जल का डायवर्जन: मानसून के चार महीनों के दौरान भरूड़ी गांव के पास उपलब्ध नर्मदा पाइपलाइन से अनफिल्टर्ड (बिना फिल्टर किया हुआ) पानी सीधे बांडी नदी में छोड़ा जाए ताकि नदी पुनर्जीवित हो सके।
- सिणधरा बांध की ऊंचाई घटाना: अनुपयोगी साबित हो चुके सिणधरा बांध की मौजूदा ऊंचाई को 45 फीट से घटाकर तत्काल 22 फीट किया जाए।
- कंट्रोल गेट्स का निर्माण: बांध पर 22 फीट की ऊंचाई पर नियंत्रित जल निकासी के लिए नए गेट बनाए जाएं, ताकि बारिश के दिनों में बांडी नदी का प्राकृतिक बहाव न रुके और डाउन स्ट्रीम के गांवों को पानी मिले।
- वंचित गांवों को नर्मदा (ER) प्रोजेक्ट से जोड़ना: वर्ष 2016 की समयसीमा वाली नर्मदा (ER) परियोजना में हो रही देरी को खत्म कर दासपां, कोरा सहित सभी वंचित गांवों को भीनमाल फिल्टर हाउस से जोड़कर नियमित पेयजल आपूर्ति शुरू की जाए।
- जल वितरण समिति का पुनर्गठन: सिणधरा बांध की जल वितरण समिति का दोबारा गठन किया जाए और इसमें प्रभावित डाउन स्ट्रीम क्षेत्र के ग्रामीण जनप्रतिनिधियों को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए।
29 जुलाई को आर-पार की जंग: किसानों ने दी महा-आंदोलन की चेतावनी
समिति के प्रमुख सेवादार श्रवण सिंह राठौड़ ने दो टूक शब्दों में प्रशासन को चेताया है कि किसानों के सब्र की परीक्षा न ली जाए। यदि राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन ने इन जनहित की मांगों पर तुरंत कोई सकारात्मक कदम नहीं उठाया, तो आगामी 29 जुलाई को क्षेत्र के सभी गांवों के किसानों की एक महापंचायत बुलाई जाएगी। इस बैठक में एक बड़े और व्यापक जनआंदोलन की रणनीति तय की जाएगी, और इसके बाद उत्पन्न होने वाली कानून-व्यवस्था की पूरी जिम्मेदारी शासन और प्रशासन की होगी।
धरने पर डटे रहे भीनमाल के ये प्रमुख चेहरे
भीनमाल उपखंड कार्यालय पर अपनी आवाज बुलंद करने के लिए भीनमाल विधानसभा क्षेत्र के विभिन्न गांवों से बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधि, किसान नेता और ग्रामीण मौजूद रहे, जिनमें प्रमुख रूप से:
कोरा सरपंच खेमराज देवासी, कावतरा सरपंच गजे सिंह चंपावत, भाजपा ग्रामीण मंडल अध्यक्ष मंगलाराम पुरोहित, उपप्रधान प्रतिनिधि मिट्ठू सिंह पादरा, किसान नेता हरजीराम चौधरी, कांग्रेस के पूर्व पंचायत समिति सदस्य हरदान सिंह चौहान, विक्रम सिंह चंपावत (दासपां), समाजसेवी रामलाल सोलंकी, पंचायत समिति सदस्य नरपत गोस्वामी, भागलसेफ्टा सरपंच तुलसाराम भील, पूर्व बैंक प्रबंधक मान सिंह चंपावत (दासपां), बन्ने सिंह चंपावत (दासपां), गवराराम पुरोहित, चुनीलाल पुरोहित, विजयराज पुरोहित, गोविंद पुरोहित, प्रहलाद पुरोहित, रणजीत सिंह, पांचाराम चौधरी (दासपां), केसाराम चौधरी (रणजी का गोलियां), फगलूराम मेघवाल (भादरड़ा), एडवोकेट दिनेश हेगड़े (रूसियार), सी.एल. गहलोत, एडवोकेट श्रवण ढाका, राणाराम लुहार (खानपुर), नाथाराम पंचाल (नरता), पारस पारंगी (भागलसेफ्टा), नारायण सिंह, मकन सिंह चौहान, इंद्र सिंह भाटी, तथा जीव सिंह चौहान (पादरा) शामिल थे।
आउट्रो: भीनमाल के कंठ सूखे हैं और खेत बंजर हो रहे हैं। अब देखना यह है कि प्रशासन किसानों के इस आक्रोश को भांपकर समय रहते कदम उठाता है या फिर 29 जुलाई को भीनमाल की धरती एक नए किसान आंदोलन की गवाह बनती है।



