निकाय चुनाव में फिर वही पुरानी बहस: क्या पार्षदों का फैसला ही तय करेगा शहर का 'सरदार' या सीधे जनता चुनेगी महापौर? अध्यक्ष चुनने के हाइब्रिड मॉडल और पारंपरिक नियमों पर चर्चा तेज; जानिए कैसे बदलता रहा है निकाय प्रमुखों के निर्वाचन का अंकगणित
राजस्थान में नगर निकाय और नगर निगम चुनावों को लेकर सियासी गलियारों में एक बार फिर चुनाव प्रक्रिया के पुराने और नए नियमों पर सुगबुगाहट शुरू हो गई है। सबसे बड़ा सवाल यही बना हुआ है कि शहर की कमान संभालने वाले महापौर, सभापति या पालिका अध्यक्ष का चुनाव प्रत्यक्ष रूप से जनता के हाथों में होना चाहिए या फिर निर्वाचित पार्षदों के जरिए? प्रदेश में निकाय प्रमुखों के चयन को लेकर नियम समय-समय पर बदलते रहे हैं, जिससे हर बार राजनीतिक समीकरण पूरी तरह उलट-पुलट जाते हैं।
निकाय चुनाव के इतिहास पर नजर डालें तो अलग-अलग सरकारों के कार्यकाल में अलग-अलग चुनावी मॉडल लागू किए गए। कभी पार्षदों के बहुमत से अध्यक्ष चुनने की पारंपरिक अप्रत्यक्ष प्रणाली लागू की गई, तो कभी सीधे जनता द्वारा मेयर चुनने का प्रयोग हुआ। इसी कड़ी में 'हाइब्रिड सिस्टम' जैसा नियम भी काफी चर्चा में रहा, जिसमें पार्षद का चुनाव न लड़ने या चुनाव हार जाने के बावजूद किसी भी योग्य उम्मीदवार के लिए निकाय प्रमुख बनने के रास्ते खुले रखे गए थे।
इस तरह के प्रयोगों के पीछे तर्क दिया जाता रहा है कि योग्य और अनुभवी चेहरों को प्रशासनिक कमान दी जा सके। हालांकि, इस व्यवस्था से यह रोचक स्थिति भी पैदा होती है कि वार्ड चुनाव में शिकस्त झेलने के बाद भी कोई नेता अपनी राजनीतिक गोटियां बिठाकर पूरे शहर का मुखिया बन सकता है।
फिलहाल, आगामी निकाय चुनावों को लेकर आम जनता और राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि सरकार चुनावों में कौन सा ढांचा बरकरार रखती है। क्या पुराने अप्रत्यक्ष नियम ही लागू रहेंगे, या फिर चुनावी प्रणाली में कोई नया मोड़ देखने को मिलेगा? यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन इतना तय है कि नियमों का यह खेल शहर की सत्ता के दावेदारों की नींद जरूर उड़ाए हुए है। फ़िलहाल जैसलमेर में हुए खेल ने इस मॉडल की और सभी का ध्यान खींचा है |









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