सर्किल न्यूज नेटवर्क रानीवाड़ा/डूंगरी। भक्ति और समरसता का एक ऐसा अनूठा काठ इन दिनों डूंगरी की धरा पर तैयार हुआ है, जिसकी गूंज पूरे मारवाड़ और आसपास के अंचलों में सुनाई दे रही है। रानीवाड़ा के समीप डूंगरी स्थित श्री पातालेश्वर गोशाला में इन दिनों ‘श्री गो कृपा कथा’ की अमृत वर्षा हो रही है। इस आयोजन का मुख्य आधार (काठ) कोई दिखावा या भव्यता नहीं, बल्कि विशुद्ध गो-सेवा और समाज की अटूट समरसता है। कथा को सुनने के लिए रानीवाड़ा कस्बे सहित दूर-दराज के गोभक्त भारी संख्या में उमड़ रहे हैं, जिससे समूचा क्षेत्र गो-मय हो उठा है।
इस भव्य धार्मिक अनुष्ठान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि डूंगरी के ३६ कौम के लोग जाति, ऊंच-नीच और आपसी भेदभाव को भुलाकर पूरी समानता के भाव से व्यवस्थाएं संभाल रहे हैं। आयोजन को पूरी तरह पारदर्शी रखने के लिए आरती, प्रसादि, टेंट सहित अन्य सभी कार्यक्रमों के चढ़ावे पहले से ही सर्वसम्मति से तय किए जा चुके हैं। कथा पंडाल में सबसे अनूठा और मनोहारी दृश्य मातृशक्ति का है; रोजाना हजारों महिलाएं अपने सिर पर मंगल कलश धारण कर कथा स्थल पहुंचती हैं और पूरे नियम-संयम के साथ गो-महिमा का श्रवण करती हैं। मंच पर कथाव्यास बाल साध्वी प्रज्ञा गोपाल सरस्वती दीदी की अमृतवाणी से गो-भक्ति की रसधार बह रही है, तो वहीं साध्वी पंखु बाई की पूरे समय गरिमामयी मौजूदगी इस आध्यात्मिक माहौल को और दिव्य बना रही है।

व्यासपीठ से गूंजा यह प्रेरक प्रसंग: जब शादी में दहेज के रूप में मांगी सिर्फ ‘एक गाय’
इसी कथा के दौरान जब व्यासपीठ से संस्कारों और गो-सेवा से जुड़ा एक संस्मरण सुनाया गया, तो पंडाल में मौजूद हजारों आंखें सजल हो उठीं। प्रसंग के अनुसार, गुजरात से आए वल्लभाचार्य और संयोगिता के विवाह का रिश्ता श्रीनाथ जी की पावन धरा ‘नाथद्वारा’ में तय हुआ था। वधु पक्ष के माता-पिता अपनी लाडली को विदा करने के लिए धन-दौलत, जेवर और ऐशो-आराम का हर सामान देने की इच्छा रखते थे, लेकिन वर पक्ष की ओर से एक ऐसी मांग सामने आई जिसने आधुनिक समाज को आईना दिखा दिया। वल्लभाचार्य ने न गाड़ी मांगी, न धन और न ही सोना-चांदी। उन्होंने केवल एक मांग रखी—”दहेज में सिर्फ एक गाय चाहिए, और वो भी बाजार से खरीदी हुई नहीं, बल्कि वधु के घर के आंगन में खुद के हाथों से लाड-प्यार से पाली-पोसी गई हो।” सनातन संस्कृति के इस अनुपम उदाहरण को सुनकर कथा पंडाल ‘गो माता की जय’ के उद्घोष से गुंजायमान हो उठा।

३ जून को होगा पूर्णाहुति का महासंगम
बीती २८ मई से शुरू हुई इस कथा का समापन आगामी ३ जून को महाप्रसादी और पूर्णाहुति के साथ होगा। गोशाला प्रबंधन और ग्रामीणों द्वारा पंडाल में आने वाले सभी श्रद्धालुओं के लिए उत्तम प्रसादी (भोजन) की व्यवस्था निरंतर की जा रही है। दूर-दराज से आ रहे भक्तों का कहना है कि डूंगरी की धरा पर सादगी, सनातन और समरसता की जो बयार बह रही है, वह आने वाली पीढ़ियों को हमारे मूल संस्कारों की याद दिलाती रहेगी।



