मेवात की लुप्त होती 2500 दोहों वाली महाभारत और शिव ब्यावले की समृद्ध मौखिक परंपरा को मिला देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान; डीग के कैथवाड़ा गांव में मना जश्न
विशेष प्रतिनिधि द्वारा
नई दिल्ली/जयपुर। देश के सबसे प्रतिष्ठित और भव्य राष्ट्रपति भवन के दरबार हॉल में सोमवार को जब ‘पद्म श्री’ पुरस्कार के लिए राजस्थान के डीग जिले के एक छोटे से गांव के कलाकार का नाम पुकारा गया, तो पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। अवसर था वर्ष 2026 के नागरिक अलंकरण समारोह (प्रथम चरण) का, जहां महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने मेवात-बृज संस्कृति के अनमोल रत्न, भपंग वादक श्री गफरुद्दीन मेवाती जोगी को कला के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए पद्म श्री से सम्मानित किया।
इस ऐतिहासिक पल के साक्षी देश के उपराष्ट्रपति श्री सी. पी. राधाकृष्णन, प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह सहित कई राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय गणमान्य जन बने। राजस्थान के लिए यह त्रिवेणी जैसा सुखद संयोग रहा, क्योंकि कला जगत से गफरुद्दीन मेवाती जोगी व श्री तगा राम भील और समाज सेवा के क्षेत्र से स्वामी ब्रह्मदेव को भी इस सर्वोच्च सम्मान से नवाजा गया।
नौवीं पास कलाकार, जिसने बचाई मेवात की अनमोल धरोहर
26 सितंबर 1962 को तत्कालीन भरतपुर (वर्तमान डीग जिला) की पहाड़ी तहसील के कैथवाड़ा गांव में जन्मे गफरुद्दीन पारंपरिक मेवाती जोगी समुदाय की विरासत को समेटे हुए हैं। औपचारिक शिक्षा तो महज नौवीं कक्षा तक ही हो पाई, लेकिन लोक संस्कृति की पाठशाला में वे अव्वल रहे। बचपन से ही उन्होंने पारंपरिक गुरु-शिष्य परंपरा के तहत भपंग, जोगिया सारंगी, ढोलक और मेवाती-बृज भक्ति संगीत में ऐसी महारत हासिल की कि आज वे इस कला के वैश्विक प्रतीक बन चुके हैं।
भिक्षाटन से लेकर वैश्विक मंचों तक का सफर
एक समय था जब गफरुद्दीन गांव-गांव जाकर लोक गाथाओं का गायन करते थे और दान-दक्षिणा (भिक्षा) लेकर अपनी परंपरा को जीवित रखते थे। उन्होंने दशकों तक कड़े संघर्ष और निरंतर सांस्कृतिक अभ्यास के बूते मेवात की मौखिक परंपराओं को मरने नहीं दिया।महाभारत के 2500 दोहे और शिव ब्यावले के रक्षक
गफरुद्दीन मेवाती जोगी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उस दुर्लभ मौखिक कथा परंपरा के संरक्षण के लिए जाना जाता है, जो आधुनिकता की आंधी में लगभग खो चुकी थी। वे महाभारत (पांडुन के कड़े- लगभग 2500 दोहे), लोक रामायण, भगवान शिव का ब्यावले और अली बख्श परंपरा की भगवान श्री कृष्ण लीलाओं का मौखिक गायन करने वाले देश के सबसे प्रामाणिक कलाकारों में से एक हैं।
उन्होंने अपनी कला साधना से लगभग 20 लुप्तप्राय लोक संगीत वाद्ययंत्रों और मौखिक कथाओं को पुनर्जीवित किया है। उनके इस भगीरथ प्रयास का महत्व इतना है कि आज इस विषय पर देश-विदेश में पीएचडी स्तर के अकादमिक शोध हो रहे हैं।संस्था की स्थापना और अगली पीढ़ी को विरासत सौंपना
अपनी कला को सिर्फ खुद तक सीमित न रखकर, गफरुद्दीन ने साल 2007 में भरतपुर में ‘बृजरंग मेवात साहित्य लोक कला संस्थान’ की स्थापना की। वे देश के प्रतिष्ठित मंचों जैसे संगीत नाटक अकादमी, जवाहर कला केंद्र (जयपुर), इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में अपनी प्रस्तुतियां दे चुके हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने अपने बेटे शाहरुख खान मेवाती जोगी, पोते दानिश जोगी और कई शिष्यों को तैयार कर इस अमूर्त विरासत को भविष्य के लिए सुरक्षित कर दिया है।
पुरस्कारों की लंबी फेहरिस्त में जुड़ा सबसे चमकीला मोती
गफरुद्दीन को मिले पुरस्कारों की फेहरिस्त बहुत लंबी है, जिसमें अब पद्म श्री सबसे ऊपर चमक रहा है:
| वर्ष | पुरस्कार/सम्मान | संस्थान/स्थान |
|---|---|---|
| 2026 | पद्म श्री | भारत सरकार (राष्ट्रपति भवन) |
| 2022 | संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार | नई दिल्ली |
| 2016 | राजस्थान राज्य सम्मान | जयपुर |
| 2013 | प्रबुद्ध लोक कलाकार सम्मान / कैस्ट्रॉल इंडिया अवार्ड | मुंबई |
| 2009 | सूर सम्मान | जयपुर |
| 1993 | युवा पुरस्कार | कला जगत |
मेवात की मिट्टी से निकलकर राष्ट्रपति भवन के लाल कालीन तक पहुंचे गफरुद्दीन मेवाती जोगी की यह सफलता यह साबित करती है कि यदि साधना सच्ची हो, तो लोक कला की गूंज दिल्ली के गलियारों को भी झंकृत कर देती है। उनके पद्म श्री बनने से आज पूरे मेवात और बृज अंचल में लोक गीतों की मधुर तान के साथ जश्न मनाया जा रहा है।



