जालोर के देवासी पशुपालकों से हरियाणा बॉर्डर पर हुई आत्मीय भेंट; बच्चों की शिक्षा-स्वास्थ्य और भविष्य को लेकर हुआ सार्थक संवाद
तपती धूप और ठंडी रातें, पर सेवा का संकल्प अडिग
जालोर/बहरोड़। विकास की चकाचौंध से दूर, जब शहर सो रहा होता है, तब देश के सीमावर्ती इलाकों में कुछ ऐसे हाथ गौ-माता की सेवा में जुटे होते हैं, जो अपने परिवार से मीलों दूर हैं। जालोर के रानीवाड़ा निवासी डॉ. रमेश कुमार देवासी के लिए बहरोड़ यात्रा के दौरान हुई एक मुलाकात ने इस हकीकत को आईना दिखा दिया। हरियाणा बॉर्डर पर जब उनकी नजरें अपने ही समाज के पशुपालकों से मिलीं, तो संघर्ष और सेवा का वह मंजर देखकर वे भी भावुक हो गए। यह सिर्फ एक मुलाकात नहीं थी, बल्कि उस अटूट परंपरा और त्याग का साक्षी बनने का पल था, जिसे देवासी समाज के लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी निभा रहे हैं।

संघर्ष की दास्तान और भविष्य की उम्मीद
जब राह चलते मिले अपनों के सुख-दुख डॉ. रमेश देवासी जब जयपुर से बहरोड़ के मंढान गाँव की ओर जा रहे थे, तब हरियाणा बॉर्डर पर उनकी भेंट उन पशुपालकों से हुई, जिन्होंने अपने गाँव-घर की सुख-सुविधाओं को पीछे छोड़ दिया है। ये वे लोग हैं जो गायों के चारे और पानी की तलाश में मीलों का सफर तय करते हैं। विपरीत परिस्थितियों और विषम मौसम की मार झेलते हुए, ये पशुपालक ‘गौ-सेवा’ को ही अपना सर्वोपरि धर्म मानकर जी रहे हैं।
शिक्षा और स्वास्थ्य: संवाद का केंद्र बिंदु इस मुलाकात के दौरान चर्चा सिर्फ गायों तक सीमित नहीं रही। डॉ. देवासी ने पशुपालकों के साथ एक पिता और अभिभावक की तरह उनके बच्चों के भविष्य पर बात की। उन्होंने पशुपालकों से बच्चों की पढ़ाई-लिखाई, उनकी स्वास्थ्य सुविधाओं और शिक्षा की राह में आ रही दिक्कतों को बारीकी से समझा। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल पशुपालन ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ी का शिक्षित होना भी अनिवार्य है ताकि वे समाज की मुख्यधारा से जुड़ सकें।

गौ-पालकों का संकल्प: सेवा ही धर्म है पशुपालकों ने डॉ. देवासी को बताया कि सीमावर्ती क्षेत्रों में रहते हुए, बिना किसी सरकारी मदद या आधुनिक सुविधाओं के, वे अपने दम पर गौ-वंश का पालन कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि “हमारा घर तो जंगल और मैदान हैं, जहाँ गायों को सुकून मिले, वही हमारा स्वर्ग है।” डॉ. देवासी ने इन पशुपालकों की मेहनत को सलाम करते हुए कहा कि समाज को ऐसे निस्वार्थ सेवा भाव वाले लोगों पर गर्व है। उन्होंने आश्वस्त किया कि वे इन पशुपालकों की आवश्यकताओं को पूरा करने और उनके बच्चों को बेहतर शिक्षा दिलाने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे।
एक नई सोच का आगाज
यह घटना हमें याद दिलाती है कि हमारे पशुपालक ही भारत की वास्तविक रीढ़ हैं। एक तरफ आधुनिकता की दौड़ है, तो दूसरी तरफ परंपरा को जीवित रखने की यह तपस्या। डॉ. रमेश देवासी की यह पहल, केवल एक भेंट नहीं बल्कि पशुपालक समाज को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने की एक नई शुरुआत है।



