मदन राठौड़ की नई कार्यकारिणी में काम करने वालों को मिली जगह, लेकिन मारवाड़ के अहम जिले की अनदेखी चर्चा का विषय
(जयपुर/जालोर) भारतीय जनता पार्टी राजस्थान के प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ ने राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा के निर्देशानुसार अपनी नई प्रदेश कार्यकारिणी की घोषणा कर दी है। संविधान दिवस (26 नवंबर) के ठीक बाद और संगठनात्मक चुनावों की सुगबुगाहट के बीच आई इस सूची ने सियासी गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है। कार्यकारिणी में जहां मेहनती कार्यकर्ताओं को पुरस्कृत करने का प्रयास दिखता है, वहीं क्षेत्रीय असंतुलन साफ झलक रहा है। सबसे चौंकाने वाला पहलू ‘गुलाबी नगरी’ जयपुर का भारी दबदबा और जालोर जैसे महत्वपूर्ण जिले का पूरी तरह ‘गायब’ हो जाना है।
जयपुर पर अति-मेहरबानी, बाकी जिलों की अनदेखी? इस नई जंबो कार्यकारिणी का विश्लेषण करें तो साफ है कि सत्ता और संगठन का केंद्र जयपुर ही बना हुआ है। सूची में जयपुर (शहर और देहात मिलाकर) से करीब 12 से ज्यादा पदाधिकारियों को जगह मिली है। इसमें कोषाध्यक्ष से लेकर मंत्री, प्रवक्ता और मीडिया प्रभारी तक जयपुर के चेहरों की भरमार है। ऐसा प्रतीत होता है कि जातियों को साधने की कवायद में जयपुर के नेताओं को थोक के भाव में समायोजित किया गया है, जिससे अन्य जिलों के हिस्से की नुमाइंदगी कम हो गई है।

जालोर को लगा झटका: देवल की छुट्टी, कोई नया चेहरा नहीं इस सूची का सबसे ‘दर्दनाक’ पहलू जालोर जिले के लिए है। पिछली कार्यकारिणी में जालोर से सांवलाराम देवासी और उससे पहले रानीवाड़ा से पूर्व विधायक नारायण सिंह देवल प्रदेश उपाध्यक्ष जैसे अहम पद पर आसीन थे। उम्मीद थी कि इस बार भी उन्हें या जिले के किसी अन्य कद्दावर नेता को संगठन में बड़ी जिम्मेदारी मिलेगी, लेकिन सूची में जालोर जिले से किसी भी नेता का नाम नहीं है। जालोर का कॉलम पूरी तरह खाली रह गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मारवाड़ के इस अहम जिले की ऐसी अनदेखी कार्यकर्ताओं में मायूसी पैदा कर सकती है।
जयपुर का दबदबा: शहर और देहात से 12 से ज्यादा चेहरे
जातिगत समीकरणों को साधने के चक्कर में संगठन ने जयपुर (शहर और देहात) को थोक के भाव में पद बांट दिए हैं। पूरी कार्यकारिणी में हर तीसरा या चौथा चेहरा जयपुर का नजर आ रहा है। इससे ऐसा संदेश जा रहा है कि पार्टी का फोकस केवल राजधानी के इर्द-गिर्द सिमट गया है।
यहाँ देखें जयपुर (शहर/देहात) के नेताओं की पूरी लिस्ट:
| क्र. | नेता का नाम | पद | क्षेत्र (जयपुर) |
| 1. | श्री नारायण मीणा | प्रदेश मंत्री | जयपुर |
| 2. | श्री अजीत मांडन | प्रदेश मंत्री | जयपुर |
| 3. | डॉ. श्याम अग्रवाल | सह-कोषाध्यक्ष | जयपुर |
| 4. | श्री कैलाश वर्मा | प्रदेश प्रवक्ता | जयपुर देहात |
| 5. | श्री कुलदीप धनकड़ | प्रदेश प्रवक्ता | जयपुर देहात |
| 6. | श्री रामलाल शर्मा | प्रदेश प्रवक्ता | जयपुर देहात |
| 7. | श्री मदन प्रजापत | प्रदेश प्रवक्ता | जयपुर |
| 8. | श्रीमती राखी राठौड़ | प्रदेश प्रवक्ता | जयपुर |
| 9. | श्रीमती स्टेफी चौहान | प्रदेश प्रवक्ता | जयपुर |
| 10. | श्री मुकेश पारीक | कार्यालय सचिव | जयपुर |
| 11. | श्री हीरेन्द्र कौशिक | सोशल मीडिया प्रभारी | जयपुर |
| 12. | श्री प्रमोद कुमार वशिष्ठ | मीडिया प्रभारी | जयपुर |
(नोट: इसके अलावा भी मोर्चों या अन्य ज़िम्मेदारियों में जयपुर के कई चेहरे शामिल हैं, जो इस ‘ओवरलोड’ को और बढ़ाते हैं।)
जिलावार स्थिति: किसे क्या मिला? नवनियुक्त कार्यकारिणी में प्रमुख जिलों की भागीदारी कुछ इस प्रकार रही:
- श्रीगंगानगर: सुरेंद्रपाल सिंह टी.टी. (उपाध्यक्ष)
- नागौर: डॉ. ज्योति मिर्धा (उपाध्यक्ष) और मिथिलेश गौतम (महामंत्री) – नागौर को अच्छा वजन मिला है।
- बीकानेर: श्रीमती सरिता गेना (उपाध्यक्ष), श्रीमती अपूर्वा सिंह (मंत्री) और अविनाश जोशी (आई.टी. प्रभारी)।
- कोटा: मुकेश दाधीच (उपाध्यक्ष)
- उदयपुर: श्रीमती अल्का मुन्दड़ा (उपाध्यक्ष)
- सीकर: श्रवण सिंह बगड़ी (महामंत्री)
संतुलन या मजबूरी? सूची में नारायण पुरोहित (सिरोही), सीताराम पोसवाल (सवाई माधोपुर) और कैलाश मेघवाल (हनुमानगढ़) जैसे नामों के जरिए अलग-अलग क्षेत्रों और समाज के वर्गों को साधने की कोशिश तो की गई है, लेकिन ‘संतुलित कार्यकारिणी’ का दावा कमजोर पड़ता दिख रहा है। काम करने वालों को जगह जरूर मिली है, लेकिन भौगोलिक दृष्टि से जयपुर का पलड़ा इतना भारी है कि बाकी राजस्थान ‘बौना’ नजर आ रहा है।
निष्कर्ष: कुल मिलाकर, मदन राठौड़ की यह टीम ‘मिशन’ मोड में तो दिखती है, लेकिन जालोर जैसे जिलों की ‘शून्य’ भागीदारी और जयपुर के ‘ओवरलोड’ ने विपक्ष ही नहीं, बल्कि अपनों को भी सवाल उठाने का मौका दे दिया है। अब देखना होगा कि संगठन इस क्षेत्रीय असंतुलन को आने वाले समय में कैसे पाटेगा। काम को सम्मान, पर भूगोल बिगड़ा निसंदेह, मदन राठौड़ ने मेहनती कार्यकर्ताओं को टीम में लिया है, लेकिन जयपुर बनाम शेष राजस्थान का अंतर बहुत ज्यादा है। जहाँ सीकर, नागौर और बीकानेर को ठीक-ठाक प्रतिनिधित्व मिला है, वहीं जालोर, बाड़मेर और आदिवासी अंचल के कई हिस्सों की भागीदारी उस अनुपात में नहीं है जितनी होनी चाहिए थी। इसे ‘संतुलित कार्यकारिणी’ कहना जल्दबाजी होगी।



