डायरिया और सांस की बीमारियों पर लगी लगाम; नवजातों की देखभाल में मरूधरा ने गाड़े कामयाबी के झंडे
राजस्थान में बच्चों की सेहत को लेकर एक बेहद सुकून देने वाली खबर सामने आई है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-6, 2023–24) के ताजा आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि प्रदेश के नौनिहालों की सेहत में लगातार सुधार हो रहा है। पिछले सर्वे (NFHS-5, 2019–21) के मुकाबले इस बार बच्चों की बीमारियों में कमी आई है और नवजातों की देखभाल के मामलों में भारी उछाल दर्ज किया गया है।
आंकड़ों की जुबानी: कहां-कहां सुधरे हालात
राज्य सरकार द्वारा स्वास्थ्य सेवाओं में किए गए भारी निवेश और जमीनी स्तर पर मुस्तैदी का नतीजा अब आंकड़ों में साफ नजर आने लगा है:
- बीमारियों पर वार: पांच साल से कम उम्र के बच्चों में डायरिया (दस्त) की दर 6.1% से घटकर 5.8% रह गई है। वहीं, सांस की गंभीर बीमारी (ARI) के लक्षण 2.9% से घटकर महज 1.7% पर आ गए हैं।
- अस्पताल पहुंचने की तत्परता: बच्चों में सांस की तकलीफ होने पर समय पर डॉक्टर के पास जाने की प्रवृत्ति 71.1% से बढ़कर 74.7% हो गई है।
- अमृत सा दूध: 6 महीने की उम्र तक बच्चों को लगातार स्तनपान कराने का आंकड़ा 98.1% के साथ बेहद मजबूत स्तर पर बना हुआ है।
- घर पर जन्म, फिर भी सुरक्षा: घर पर होने वाले जन्मों के मामलों में भी, डिलीवरी के 24 घंटे के भीतर स्वास्थ्य केंद्र जाकर जांच कराने का ग्राफ 1.3% से बढ़कर 4.0% हो गया है। इसके अलावा, जन्म के दो दिनों के भीतर मिलने वाली नवजात देखभाल (Postnatal Care) भी 86.9% से बढ़कर 89.6% पहुंच गई है।
कैसे मुमकिन हुआ यह बदलाव?
राजस्थान ने नवजातों और बच्चों को बेहतर इलाज देने के लिए अपनी पूरी स्वास्थ्य प्रणाली को री-इंजीनियर किया है। इस सुधार के पीछे मुख्य रूप से तीन बड़ी कड़ियां काम कर रही हैं:
1. स्टेट न्यूबॉर्न रिसोर्स सेंटर: प्रदेश में 6 विशेष रिसोर्स सेंटर बनाए गए हैं, जो जिला अस्पतालों की ‘स्पेशल न्यूबॉर्न केयर यूनिट्स’ (SNCU) को ट्रेनिंग, नए प्रोटोकॉल और ‘SNCU क्वालिटी इंडेक्स’ के जरिए मजबूत बना रहे हैं।
2. डॉक्टरों और स्टाफ की खास ट्रेनिंग: बीते कुछ सालों में ‘नवजात शिशु सुरक्षा कार्यक्रम’, फैमिली पार्टिसिपेटरी केयर और CPAP रेस्पिरेटरी सपोर्ट जैसी आधुनिक तकनीकों के लिए डॉक्टरों और नर्सों को विशेष रूप से प्रशिक्षित किया गया है।
3. कम वजन और समय से पहले जन्मे बच्चों की निगरानी: ‘होम बेस्ड न्यूबॉर्न केयर’ (HBNC) और ‘होम बेस्ड केयर फॉर यंग चाइल्ड’ (HBYC) के तहत स्वास्थ्य कर्मी अब कमजोर बच्चों के घर-घर जाकर अतिरिक्त विजिट कर रहे हैं, ताकि उनकी ग्रोथ और विकास पर नजर रखी जा सके।
आपातकाल के लिए 41 पीडियाट्रिक यूनिट्स मुस्तैद
गंभीर रूप से बीमार बच्चों को तुरंत और उच्च स्तरीय इलाज देने के लिए राज्य के जिला अस्पतालों में 41 डेडिकेटेड पीडियाट्रिक यूनिट्स (विशेष बाल चिकित्सा इकाइयां) स्थापित की जा चुकी हैं। ये इकाइयां हाई डिपेंडेंसी यूनिट्स (HDU) और पीडियाट्रिक आईसीयू (PICU) से लैस हैं, जहां मजबूत रेफरल सिस्टम के जरिए बच्चों की जान बचाई जा रही है।
चुनौती अब भी बरकरार:
हालांकि, रिपोर्ट में यह भी साफ किया गया है कि बच्चों में कुपोषण और गंभीर रूप से कम वजन (Undernutrition) की समस्या अब भी राज्य के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। लेकिन नवजात और बाल स्वास्थ्य सेवाओं में किए गए ये हालिया निवेश यह भरोसा जगाते हैं कि राजस्थान का आने वाला कल बेहद सेहतमंद होगा।



