सुंधा माता कंजर्वेशन रिजर्व के गांवों में ‘घेराव नहीं, ठहराव’ ही बचाएगा जान, फॉरेस्टर प्रभुराम जाट की विशेष अपील।
पहाड़ों में सूखा, पानी की तलाश में आबादी की तरफ कदम
जालौर जिले का जसवंतपुरा अंचल अपनी प्राकृतिक खूबसूरती और समृद्ध वन्यजीवों के लिए जाना जाता है। साल 2011 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार द्वारा इसे ‘सुंधा माता कंजर्वेशन रिजर्व’ घोषित कर करीब 15,000 स्क्वायर हैक्टेयर क्षेत्र को भालुओं के लिए सुरक्षित किया गया था। लेकिन वर्तमान में भीषण गर्मी के मौसम के कारण पहाड़ों में न तो पर्याप्त भोजन है और न ही पीने का पानी। ऐसे में वन्यजीवों का पानी की तलाश में पहाड़ी से नीचे उतरकर गांवों की तरफ आना एक सामान्य और स्वाभाविक प्रक्रिया है।

चांदूर गांव की घटना: घेराव बना हमले की वजह
डीएफओ जयदेव सिंह चारण ने मौके से बताया कि हाल ही में जसवंतपुरा से भीनमाल मार्ग पर स्थित चांदूर गांव में दो भालू पानी की तलाश में विचरण करते हुए आबादी क्षेत्र में आ गए। अमूमन शांत रहने वाले इन जीवों को देखकर ग्रामीणों में घबराहट फैल गई और उन्होंने भालुओं के जोड़े को चारों तरफ से घेर लिया। खुद को असुरक्षित और रास्ता बंद पाकर भालुओं ने आत्मरक्षा में ग्रामीणों पर हमला कर दिया, जिससे अफरा-तफरी मच गई। यह घटना साबित करती है कि अगर चांदूर के ग्रामीणों ने भालुओं को घेरा नहीं होता, तो वे चुपचाप पानी पीकर वापस अपने प्राकृतिक आवास की ओर लौट जाते।

कोबरा और लेपर्ड की तर्ज पर अपनाना होगा सह-अस्तित्व
इस गंभीर विषय पर जसवंतपुरा रेंज में तैनात फॉरेस्टर प्रभुराम जाट ने क्षेत्र के 15-20 गांवों के ग्रामीणों से एक बेहद मर्मस्पर्शी और व्यावहारिक अपील की है। उन्होंने कहा:
“हमारे खेतों और घरों से जब काला नाग या कोबरा निकलता है, तो हम उसे डिस्टर्ब नहीं करते, वह चुपचाप पास से निकल जाता है। इसी तरह पाली के जवाई क्षेत्र में पशुपालक लेपर्ड (तेंदुए) के साथ सदियों से सामान्य रूप से रह रहे हैं। ठीक उसी तर्ज पर जसवंतपुरा के लोगों को भी भालू को अपने परिवार का एक सदस्य मानना होगा। भालू कभी भी सोते हुए इंसान या सीधे रास्ते चलते राहगीर को परेशान नहीं करता। जब तक आप उसे छेड़ेंगे या घेरेंगे नहीं, वह आपको कोई नुकसान नहीं पहुंचाएगा।”
क्या करें जब भालू गांव या आबादी में आ जाए?
वन विभाग की गाइडलाइन और फॉरेस्टर प्रभुराम जाट के अनुसार, ऐसी स्थिति में ग्रामीणों को निम्नलिखित समझदारी दिखानी होगी:
- सुरक्षित दूरी बनाएं: भालू को देखकर शोर मचाने, पत्थर फेंकने या लाठियां लेकर घेरने के बजाय उससे सुरक्षित दूरी बना लें।
- रास्ता खाली छोड़ें: भालू को वापस जंगल में जाने का सुरक्षित रास्ता दें। रास्ता मिलने पर वह खुद ही लौट जाता है।
- भीड़ और वीडियोबाजी से बचें: उत्सुकता या डर में आकर मोबाइल से वीडियो बनाने या तमाशबीन बनकर भीड़ जुटाने से जानवर हिंसक हो जाता है।
- वन विभाग को सूचना दें: यदि भालू घायल है या लंबे समय से आबादी में ही रुका हुआ है, तो तुरंत प्रशिक्षित वनकर्मियों को सूचित करें।
वन विभाग रख रहा है व्यवहार पर पैनी नजर
चांदूर की घटना के बाद वन विभाग की टीम लगातार क्षेत्र में मॉनिटरिंग कर रही है। दोनों भालुओं की गतिविधियों और व्यवहार पर लगातार नजर रखी जा रही है, जो कि वर्तमान में पूरी तरह सामान्य पाया गया है। वन विभाग की टीमें अब गांवों में जाकर, स्कूलों और ग्राम सभाओं के माध्यम से लोगों को वन्यजीवों के प्रति सही व्यवहार अपनाने के लिए जागरूक कर रही हैं, ताकि भविष्य में ऐसी किसी दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना से बचा जा सके।
पर्यटन और पर्यावरण दोनों को होगा फायदा
जसवंतपुरा अंचल के लोगों के लिए भालू संकट नहीं, बल्कि इस क्षेत्र की पहचान और गौरव हैं। यदि इंसान और भालू आपस में बेहतर तालमेल और समझदारी के साथ सह-अस्तित्व बनाकर रहेंगे, तो न केवल बेजुबान सुरक्षित रहेंगे, बल्कि इस इलाके में वाइल्डलाइफ टूरिज्म (वन्यजीव पर्यटन) भी बढ़ेगा, जिसका सीधा फायदा स्थानीय लोगों को होगा। प्रकृति के साथ संतुलन बनाना अब मजबूरी नहीं, बल्कि बदलते समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
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