ग्राम सेवा सहकारी समितियों के कार्मिकों ने सरकार के खिलाफ खोला मोर्चा; 27 फरवरी से कार्य बहिष्कार जारी, अब अप्रैल में विशाल रैली की तैयारी
रानीवाड़ा/जयपुर। राजस्थान सहकारी कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति ने प्रदेश की ग्राम सेवा सहकारी समितियों (GSS) के कार्मिकों की लंबित समस्याओं को लेकर राज्य सरकार के खिलाफ निर्णायक जंग का ऐलान कर दिया है। मुख्यमंत्री के नाम प्रेषित मांग पत्र में संघर्ष समिति ने स्पष्ट किया है कि यदि मार्च माह तक उनकी जायज मांगों का सकारात्मक निराकरण नहीं हुआ, तो अप्रैल माह में जयपुर की सड़कों पर विशाल रैली और महापड़ाव डाला जाएगा।
समिति के प्रदेशाध्यक्ष हनुमान सिंह राजावत, मदन मेनारिया और कुलदीप जंगम ने संयुक्त बयान में कहा कि कर्मचारी पिछले लंबे समय से अपने हक की लड़ाई लड़ रहे हैं, लेकिन शासन-प्रशासन की ओर से केवल आश्वासन ही मिल रहे हैं।
ये हैं प्रमुख मांगें:
संघर्ष समिति ने अपनी मांगों को प्रमुखता से सरकार के समक्ष रखा है:
- कैडर अथॉरिटी एवं नियोक्ता का निर्धारण: कार्मिकों के लिए स्पष्ट कैडर अथॉरिटी तय की जाए। कमेटी द्वारा सुझाव लेने के बावजूद पिछले तीन माह से पत्रावलियाँ लंबित हैं, जिन्हें तुरंत निस्तारित कर आदेश जारी किए जाएं।
- ऋण पर्यवेक्षकों के पदों पर शत-प्रतिशत नियुक्ति: केंद्रीय सहकारी बैंकों में ऋण पर्यवेक्षकों के रिक्त पदों पर केवल समिति व्यवस्थापकों को ही प्राथमिकता देकर शत-प्रतिशत नियुक्ति दी जाए। साथ ही, इस प्रक्रिया में आयु सीमा की बाध्यता को पूरी तरह समाप्त किया जाए।
- कार्मिकों का नियमितीकरण: 10 जुलाई 2017 से पूर्व नियुक्त उन कार्मिकों के लिए नियमितीकरण की प्रक्रिया पुनः शुरू की जाए जो पूर्व में वंचित रह गए थे। इसके अलावा व्यवस्थापक, सहायक व्यवस्थापक, सेल्समैन, चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी और कंप्यूटर ऑपरेटरों के लिए आयु सीमा 18 से 40 वर्ष के अनुसार संशोधित कर नियमितीकरण का लाभ दिया जाए।
- बैंकिंग सहायक (20% कोटा) भर्ती: जिला केंद्रीय सहकारी बैंकों में बैंकिंग सहायक के पदों पर व्यवस्थापकों के लिए आरक्षित 20 प्रतिशत कोटे की चयन प्रक्रिया को बिना किसी देरी के अविलंब प्रारंभ किया जाए।
आंदोलन की राह पर कर्मचारी
विदित रहे कि प्रदेश भर के सहकारी कर्मचारी अपनी मांगों को लेकर बीते 27 फरवरी से निरंतर कार्य बहिष्कार पर हैं। संघर्ष समिति के सदस्यों ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते समाधान नहीं हुआ, तो आंदोलन को और उग्र किया जाएगा, जिसकी समस्त नैतिक एवं कानूनी जिम्मेदारी शासन और प्रशासन की होगी।



